8. सावधान आगे पदमा नाच रही है

 


सावधान आगे पदमा नाच रही है


हमारी गाड़ियां बोमडिला की चढ़ाई हौले-हौले तय करती जा रही थीं। मैं अब अपनी सीट पर संभल कर बैठ गया था और चौकन्ना हो कर शहीदों की समाधियों को सेल्यूट कर रहा था ताकि नायक यादव को मेरे हृदय में चल रही झंझानिल का अहसास न हो। 


बोमडिला की ऊँचाई लगभग 7920 फुट है। जुलाई महीने में वहां ठंड थी। बादल पेड़ों के शिखरों को छू रहे थे। हर तरफ शांत माहौल था।  यद्यपि बोमडिला अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले का मुख्यालय है,  पर  उस जमाने में वहां सड़क पर या सड़क के आसपास कोई खास हलचल नहीं थी। सड़क के किनारे कहीं-कहीं झोपड़ीनुमा होटल थे जिनको पारंपरिक वेषभूषा में सज्जित वहां की औरतें  चलाती नज़र आईं थीं।  नायक यादव ने मुझे बताया था कि उन होटलों में खाने को दाल-चावल, मीट मछली और पीने को  अपनी रुचि के मुताबिक चाय अथवा मदिरा मिल जाती थी। 


कहते हैं कि मध्यकाल में बोमडिला तिब्बत के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। कुछ साक्ष्य इस बात के भी पाए जाते हैं कि यहां पर भूटान की जनजातियों का शासन रहा है। किसी जमाने मे बोमडिला दर्रे से तिब्बत के ल्हासा तक सीधा रास्ता जाता था| चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद काफी संख्या में तिब्बती  बौद्ध भिक्षु यहां आकर बस गए थे।  इसलिए  बोमडिला के आस पास बौद्ध संस्कृति का व्यापक प्रभाव है।  चीन और भारत के बीच यह इलाका लम्बे समय से विवाद का विषय बना रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन  की सेना ने बोमडिला पर क़ब्ज़ा कर लिया था लेकिन बाद में चीनी सेना अपने आप वापस लौट गई थी। 


कुछ देर के बाद हम बोमडिला को पार कर दूसरी ओर की ढलान से नीचे उतर रहे थे।  तभी देखते ही देखते हम से थोड़ी सी दूरी पर आगे ऊपर से बड़ी-बड़ी चट्टानें और मिट्टी खिसक कर सड़क पर आ गई थी जिसकी बजह से हमारी दोनों गाड़ियां रुक गईं थी। उस समय उस सड़क पर प्राइवेट वाहन नहीं दिखते थे। 


मैं अपनी गाड़ी से उतर कर उप-कमान अधिकारी के पास गया था वह भी अपनी जोंगा से नीचे उतर आए थे। उन्होंने स्थिति का जायजा ले कर अंदेशा जताया था कि शायद ही उस दिन सड़क खुल पाए।  उन्होंने दोपहर का भोजन कर लेने के लिए कहा था।  उनकी गाड़ी में उनका खाना था पर मैं तो अपना खाना साथ ले कर आया ही नहीं  था। मैं चुपचाप अपनी गाड़ी की ओर लौट गया था। मैंने नायक यादव को दोपहर का भोजन कर लेने के लिए कहा था।  


मैं मन ही मन सोच रहा था कि  यादव अपने साथ खाना लाए होगें या नहीं तभी नायक यादव ने पीछे बैठे जवान को गाड़ी में रखा खाना निकालने के लिए आवाज दी थी।  वह जवान गाड़ी से एक बड़ा सा पतीला, जिसमें पूरियां और सब्ज़ी भरी थी, निकाल कर ले आया था। उप-कमान अधिकारी के ड्राइवर और सहायक भी अपना खाना लेकर हमारे पास ही आ गये थे। उनके पास भी पूरियां और सब्ज़ी थी। 


सफर के दौरान सैनिकों को अक्सर पूरियां अथवा पीला चावल और सूखी सब्जी दी जाती है। खाने से भरा पतीला गाड़ी के बोनट पर रख कर हम सभी ने मिल बांट कर भोजन का आनंद लिया था।  सभी ने खाना अपने हाथों पर रख कर खाया था। नायक यादव ने बचा  हुआ भोजन ढक-संभाल कर रख लिया था। 


कुछ ही देर में ग्रेफ (GREF) के आदमी और मशीनें सड़क को साफ करने के लिये पहुंच गये थे।  उन्होंने तेजी से काम करके लगभग दो-अढ़ाई घंटों में जीप निकालने लायक सड़क साफ कर दी थी। उन्होंने बड़ी-बड़ी चट्टानों को नीचे धकेलने के लिए विस्फोटकों का प्रयोग बड़ी कुशलता के साथ किया था। उनकी कार्य-कुशलता देख कर मैं दंग रह गया था। 


उप-कमान अधिकारी महोदय ने मुझे बताया कि उनकी जोंगा तो निकल जाएगी पर वन टन गाड़ी को निकालने जितना रोड साफ करने में देरी लगेगी। उन्होंने मुझे सड़क खुलने तक इंतज़ार करने को कहा था और उसके साफ होते ही सैंगे (Senge) नामक जगह पर आ जाने के निर्देश दिये थे जहां उन्होंने हमारा इंतज़ार करना था। उन्होंने बताया कि रात के गर्म खाने और सोने का प्रबंध वहीं होगा। यह कह कर वह चल दिए थे। उस क्षेत्र में अकेली गाड़ी ले जाने के आदेश नहीं थे। उप-कमान अधिकारी महोदय की जोंगा के साथ वहां रुकी हुई दो जीपें और मिल गईं थीं। 


लगभग एक घंटे के बाद हमारी गाड़ी को भी आगे बढ़ने का संकेत मिल गया था। हमारे साथ सैनिक गाड़ियों का एक काफिला चल रहा था। मेरे पूछने पर नायक यादव ने बताया था कि हमें सैंगे तक पहुचने तक अंधेरा हो जाना था। 


वहां मैंने देखा था कि कई जगह पर सड़क  के किनारे सूचना पट ( बोर्ड)  लगे हुए थे जिनमें लिखा था "सावधान आगे पदमा नाच रही है"। उन दिनों देवानंद की फ़िल्म 'जानी मेरा नाम' में अभिनेत्री पदमा खन्ना के एक मादक नृत्य की यादें लोगों की याददाश्त में ताजी थीं।  बोर्ड पर लिखा हुआ होने के बावज़ूद मुझे पदमा कहीं नाचती नज़र नहीं आई।  जब मैंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए उसके बारे में नायक यादव से पूछा तो उन्होंने जोर से एक ठहाका लगाया और कहने लगे, ' बाबू जी, कृष्ण भगवान की दया से अच्छा हुआ हमें अभी तक पदमा का नाच नज़र नहीं आया।'  मैंने हैरानी से उनके चेहरे की ओर देखते  हुए कहा, 'यादव, मैं समझा नहीं।' 'सर, जहां-जहां ग्रेफ वालों ने ये बोर्ड लगाए हैं उन जगहों पर पहाड़ों से पत्थर गिरते हैं। इतनी ऊंचाई  से नीचे आता एक छोटा सा पत्थर भी जानलेवा हो सकता है।' 


मैं  सहम कर चुपचाप अपनी सीट पर बैठे, आगे की ओर देखता हुआ, मन ही मन भगवान से  प्रार्थना करने लगा था कि उस दिन पदमा का नाच न दिखाई दे।


― भगत राम मंडोत्रा 

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