10. मुझे शर्मिंदा मत करना
मुझे शर्मिंदा मत करना
जैसे कि मैंने इस बात का पहले भी ज़िक्र किया है कि एक दो मौके ऐसे आए थे जब मेरे मन में सेना की नौकरी छोड़ देने की बात आई थी। पहली बार सेना को छोड़ने का विचार बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग के दौरान मेरे दिमाग में आया था।
मैं जुलाई सन् 1975 में बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए तोपखाना प्रशिक्षण केन्द्र, हैदराबाद पंहुचा था। प्रशिक्षण के दौरान हमें एक दिन फायरिंग का अभ्यास करवाया जा रहा था। हथियार था―कार्बाइन मशीन 9 एमएम। मुठभेड़ की लड़ाई के लिए यह बड़ा कारगर शस्त्र हुआ करता था। एक नायक रैंक के प्रशिक्षक की देखरेख में फायरिंग चल रही थी। तकरीबन सौ गज पीछे एक जेसीओ भी बैठे थे। बायाँ पैर आगे और दायाँ पैर पीछे रख कर हथियार को कमर से सटा कर कम दूरी पर स्थापित टारगेटों पर गोलियां चलाई जा रहीं थी। हर प्रशिक्षु के सामने तीन-तीन टारगेट स्थापित किए गए थे। पहले टारगेट पर गोली चलाने के बाद अगला पैर स्थिर रखते हुए पिछले पैर से हरकत करनी थी और अगले टारगेट पर निशाना साध कर गोली चलानी थी। मैं सिखाए गए ढंग से गोलियां दाग रहा था पर प्रशिक्षक महोदय को मेरे फायर करने के तरीके में न जाने क्या गलती नज़र आई कि उन्होंने लकड़ी से बने एक छोटे से नुकीले पॉइंटर से मेरी गर्दन के पिछले भाग में प्रहार कर दिया। मैं दर्द से तिलमिला उठा था। मैंने क्रोध में आकर अपने हथियार की मैगज़ीन में शेष बचीं तीनों गोलियां उस प्रशिक्षक के छाती में उतारने की सोच ली। उसके लिए मैंने हथियार के चेंज लीवर को 'आर' से 'ए' पर कर दिया अर्थात् उसके उपरांत बाकी तीनों गोलियां एक बर्स्ट के रूप में एक साथ निकलनीं थीं।
संभवतः उन प्रशिक्षक महोदय ने मेरे चेहरे के भावों को पढ़ लिया था। वे तुरंत मेरी पीठ के पीछे हो लिए और उन्होंने मुझे 'भूमि शस्त्र' का आदेश दे दिया अर्थात् मुझे शस्त्र ज़मीन पर रख देना था। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मैंने आदेश का पालन किया और शस्त्र को ज़मीन पर रखने से पहले चेंज लीवर को 'ए' से 'एस' अर्थात् 'स्टॉप' पर कर दिया। उन्होंने मुझे, दंड स्वरूप, हाथ ऊपर उठा कर उस भूखंड के दस चक्र लगाने का आदेश दिया। चंद क्षणों में घटित इस घटना की मेरे साथी रंगरूटों को हवा तक नहीं लगी थी।
अगर मैंने उस दिन क्षणिक आवेश में आकर उस प्रशिक्षक पर गोलियां दाग दीं होतीं तो मेरा जीवन नरक बन गया होता। मैं एक शानदार जिंदगी जीने से महरूम हो जाता।
उन दिनों सेना में प्रशिक्षकों का रंगरूटों पर हाथ उठाना एक आम बात हुआ करती थी। अपना प्रशिक्षण पूरा करके यूनिट में जाने के उपरांत मुझे पता चला था कि किसी रंगरूट को हद से ज्यादा तंग करने पर उन प्रशिक्षक महोदय का कोर्ट मार्शल हुआ था और फलस्वरूप उन्हें सेना से बरखास्त कर दिया गया था।
उस समय फ़ौज में भर्ती होकर फिर उससे छुटकारा पाना लगभग असम्भव था। अतः मेरे मन में सेना से भागने का विचार आया था पर सेना में भर्ती होने के समय भर्ती अफ़सर द्वारा दी गई नसीहत ने मुझे भगौड़ा होने से रोक लिया था।
दरअसल फ़ौज में मेरा भर्ती होना आम आदमी से थोड़ा हट कर, अलग सा था। सन् 1975 के मार्च महीने का अन्तिम सप्ताह था। मैं धर्मशाला से घर आ रहा था। पालमपुर के पुराने बस अड्डे पर उतर कर मैं भर्ती अफ़सर से मिलने की मंशा ले कर सीधा शाखा भर्ती कार्यालय में गया। उस समय भर्ती कार्यालय घुग्गर के नाले पर बनी पुलिया से थोड़ा ऊपर की ओर स्थित था। मेरे द्वारा की गई मिन्नतों के बावजूद मुझे गेट पर तैनात संतरी ने अन्दर जाने नहीं दिया। निराश होकर मैंने घर के लिए बस पकड़ ली। मैं संघोल खड में बस से उतर कर अपने घर (चम्बी) जाने के बजाय सीधा संघोल पोस्ट ऑफिस गया। वहां से एक पोस्टकार्ड खरीद कर उस पर शाखा भर्ती अफ़सर, पालमपुर के नाम एक अर्जी लिख कर उसे लेटर बॉक्स में डाल आया। आठ-नौ दिन गुज़र जाने के बाद मुझे भर्ती अफ़सर लेफ्टिनेंट कर्नल जी.ए. डेविड महोदय का एक पोस्ट कार्ड मिला। उन्होंने मुझे पालमपुर आकर मिलने के लिए लिखा था। मैंने शाखा भर्ती कार्यालय में प्रवेश करते समय वो पोस्ट कार्ड हाथ में पकड़ रखा था। गेट पर तैनात सन्तरी ने पोस्टकार्ड पर भर्ती अफ़सर की मोहर देख कर मुझे अंदर जाने दिया।
मैंने भर्ती अफ़सर के ऑफिस के दरवाजे पर खड़े हो कर ''मे आई कम इन, सर'' कह कर अन्दर जाने की इजाज़त मांगी। अन्दर से एक भारी भरकम आवाज आई, ''वेट''। कुछ देर प्रतीक्षा करने के उपरांत मैंने फिर से अन्दर जाने की आज्ञा मांगी जो मुझे मिल गई। सैनिक वर्दी में सजे लेफ्टिनेंट कर्नल जी.ए. डेविड महोदय मुझे अन्दर आते हुए ध्यान से देख रहे थे। मैंने अपने हाथ में पकड़ा उनका पोस्ट कार्ड उनके सामने रख दिया। उन्होंने उस पोस्ट कार्ड पर नज़र डाल कर मुझ से प्रश्न किया था, ''मुझ से क्या चाहते हो?''
''सर, मैं आर्मी में जाना चाहता हूँ।''
''देखो, मैं तुम्हें दो तरीके से एनरोल कर सकता हूँ―एक आर्मी एजुकेशन कोर में हवलदार और दूसरा आर्मी में सिपाही क्लर्क के तौर पर। बताओ तुम्हें कहाँ जाना है?''
''सर, आप मुझे इन दोनों में से पहले क्या बना सकते हो?'' मैंने विनम्रता से पूछा था।
'अभी तो मैं तुम्हें क्लर्क बना सकता हूँ। एजुकेशन हवलदार बनने के लिए तीन महीने बाद जुलाई में आना पड़ेगा।'
मैंने उस समय सोचा था कि जुलाई महीने में मुझे भर्ती दफ्तर के अंदर कौन आने देगा और क्या पता कर्नल साहब उस समय वहां होंगे भी या नहीं। मैंने तुरन्त जवाब दिया था, 'सर, मुझे क्लर्क बनना है।'
'ओ के, कपड़े उतारो और बाहर लगी उस लाइन में लग जाओ।'
उनके ऑफिस के बरामदे के पास भर्ती उम्मीदवारों की एक लम्बी सी लाइन नज़र आ रही थी। मैं कपड़े उतार कर कच्छे में सब से पीछे जा कर खड़ा हो गया। मैं उस समय पतला-दुबला सा था। मेरे आगे मोटे-तगड़े पहलवान सरीखे लड़के थे। मैं सोच रहा था काश मैं भी उन जैसा होता। भर्ती अफ़सर के ऑफिस के दरवाजे के ठीक सामने बरामदे की कड़ी से भारतोलन मशीन लटक रही थी। उम्मीदवार अपनी बारी आने पर उससे लटक रहे थे। सूबेदार मेजर साहब मशीन के कांटे को ध्यान से देख रहे थे। फिर वे फीते से उम्मीदवार की छाती को बिना फुलाए और फुलाने के बाद नाप रहे थे। उसके उपरांत वे चाक से उम्मीदवार की छाती पर 'फिट' या 'अनफिट' का निशान लगा रहे थे।
जब लाईन में मेरे आगे तीन-चार लड़के रह गए थे तब लेफ्टिनेंट कर्नल साहब स्वयं बाहर आकर उम्मीदवारों का नाप-तोल करने लग पड़े थे। उन्होंने उनमें से मुझे ही 'फिट' घोषित किया था। उसके बाद वो अंदर जा कर अपनी कुर्सी पर बैठ गए और सूबेदार मेजर साहब ने अपना काम पुनः संभाल लिया था।
मैंने कुछ देर के बाद उसी हालत में उनके कार्यालय में जा कर उनसे पूछा कि उसके आगे मुझे क्या करना है। उन्होंने अपने सामने बैठे एक कैप्टन साहब की ओर इशारा करते हुए मुझ से कहा, 'अब डॉक्टर साहब आपका मेडिकल चेकअप करेंगे। सामने दाईं तरफ इनका ऑफिस है वहां जाकर बाहर खड़े हो जाओ।' थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब ने आकर मेरा मेडिकल परीक्षण करके मुझे सेना के लिए फिट पाया था।
मैं पूरे कपड़े पहन कर फिर से कर्नल साहब से मिला और अगली प्रक्रिया के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे बताया कि अगले सोमवार को मेरी लिखित परीक्षा होगी। उसमें तब की दसवीं कक्षा के पाठ्यक्रम के अनुसार अंग्रेजी का प्रश्नपत्र दो घण्टे में हल करना था। उन्होंने मुझे इस बात से अवगत कराया कि वे उस परीक्षा में मेरी कोई सहायता नहीं कर पाएंगे।
निर्धारित दिन को 28 अभ्यर्थी परीक्षा देने बैठे थे। सभी ने जमीन पर लाइनों में बैठ कर परीक्षा दी। कर्नल साहब ने वहां एक चक्कर लगाया। वे काफी देर तक मेरे पास खड़े हो कर मेरे पर्चे को देखते रहे थे।
परीक्षा समाप्त होने पर सभी अभ्यर्थी अपने-अपने घर लौटने को तैयार खड़े थे। तब कर्नल डेविड साहब ने अपना अर्दली भेज कर मुझे अपने ऑफिस में बुला कर पूछा था, "कैसे हुआ तुम्हारा पेपर?" "सर, 28 कैंडिडेट्स में अगर एक भी पास हुआ तो वो मैं हूँगा।" मैंने उत्तर दिया था। कर्नल साहब ने मुस्करा कर कहा था, "अब जाओ और रिजल्ट का इंतज़ार करो।"
जब मुझे लगभग तीन महीने तक कोई सूचना नहीं मिली तो मैं पता करने के लिए भर्ती दफ्तर पालमपुर गया पर मुझे अन्दर नहीं जाने दिया गया। दिन बीतते गए। आखिर जुलाई के पहले सप्ताह में मुझे एक टेलीग्राम मिली जिसमें सफल घोषित होने पर मुझे 14 जुलाई को ऑरिजिनल सर्टिफिकेटों के साथ भर्ती कार्यालय में रिपोर्ट करने को कहा गया था। उस परीक्षा में केवल दो ही लड़के उत्तीर्ण हुए थे जिनमें एक मैं था। मुझे तोपखाना प्रशिक्षण केन्द्र, हैदराबाद जाना था। राहदारी और रेलवे वारंट लेकर मुझे कर्नल साहब से मिलने भेजा गया। उन्होंने सेना की पहली तनख्वाह के रूप में मुझे राह ख़र्च के लिए 20 रूपए देते हुए कहा था, "बेटा मैंने तुम्हें भर्ती तो कर लिया है पर तुम कभी फ़ौज से भगौड़ा हो कर मुझे शर्मिंदा मत करना।"
लेफ्टिनेंट कर्नल जी.ए. डेविड साहब की इस नसीहत का मैं हमेशा पालन करता रहा।
— भगत राम मंडोत्रा
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