11. जसवंत गढ़
जसवंत गढ़
सेला दर्रे पर दाईं ओर उत्तर दिशा में चीन की तरफ फैली एक दुर्गम पर्वत श्रृंखला नज़र आती है और बाईं ओर नीचे की ओर पसरी हुई एक घाटी है। उसी से होकर तवाँग के लिए सड़क जाती है। हमारी गाड़ी नीचे की ओर उतर रही थी। जोंगा हमसे काफी आगे निकल गई थी पर हमारी नज़रों से ओझल नहीं हुई थी।
मैं और नायक याद राम यादव तब तक आपस में अच्छी तरह घुल-मिल गए थे। नायक यादव ने मुझे बताया कि हमने पिछले दिन सेना के कुछ नियमों को तोड़ा था। जब हम बोमडिला की ढलान पर भूस्खलन होने के कारण रुकने के बाद चले थे तो उस समय हमारे साथ दूसरी गाड़ियाँ भी थीं पर दिराँग में सभी गाड़ियाँ रात के लिए रुक गईं थीं। केवल हमारी गाड़ी ही सेंगे के लिए आगे बढ़ी थी। एक तो अकेली गाड़ी दूसरा साँयकाल अर्थात् अंधेरे की दस्तक, दोनों बातें वहाँ के नियमों के विरुद्ध थीं। सीनियर मैं था अतः नियमों के उल्लंघन के लिए जवाबदेही भी मेरी ही थी। प्रभु कृपा से सब कुछ ठीक रहा था। उप-कमान अधिकारी को भी हमारी खैरियत की चिंता थी तभी तो वह ट्रांजिट कैंम्प में बार-बार हमारे पहुंचने के बारे में पूछताछ कर रहे थे। उस क्षेत्र में अक्सर सेना आपूर्ति कोर (आर्मी सप्लाई कोर) की गाड़ियों के काफ़िले चलते थे और दूसरी यूनिटों की छिटपुट गाड़ियाँ उस काफ़िले के साथ हो लेती थीं।
मोटे तौर पर स्थल सेना को दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है। पहला भाग लड़ाकू होता है जो आमने-सामने होकर, शत्रुओं से लड़ता है। सेना का दूसरा भाग अपने लड़ाकू भाग को सेवाएं प्रदान करता है जैसे कि वस्त्र, भोजन, हथियार, गोला- बारूद, इत्यादि। थल सेना के लड़ाकू भाग में आर्म्ड कोर (टैंकों वाली सेना), आर्टिलरी (बड़ी तोपों से सज्जित सेना), इन्फेंट्री (पैदल व बख्तरबन्द सेना), इंजीनियर और सिग्नल कोर शामिल हैं। इन्हें अँग्रेजी में 'आर्म्स' कहा जाता है। दूसरे भाग में थल सेना को सेवाएं प्रदान करने वाले आर्मी सप्लाई कोर, आर्डनेंस कोर, ईएमई, सेना चिकित्सा कोर, सेना डेंटल कोर, सेना डाक सेवा कोर, सेना पुलिस कोर, इत्यादि आते हैं। इन्हें 'सर्विसेज' कहा जाता है। 'आर्म्स' को सेना के 'टीथ' और 'सर्विसेज' को 'टेल' माना जाता है। कोई भी सेना कितनी असरदार है ये इस पर निर्भर करता है कि उस के 'टीथ' बड़े हैं या 'टेल'।
हमारी सेनाओं के दो मुख्य कार्य होते हैं। पहला और प्रमुख कार्य है अपने देश की सीमाओं की रक्षा करना और दूसरा कार्य है प्राकृतिक आपदा के समय तथा आंतरिक अशांति के समय बुलाये जाने पर सरकार और प्रशासन की सहायता करना।
थोड़ी देर चलने के उपराँत एक जगह पर कुछ सैनिक चलते-फिरते नज़र आने लगे। उप-कमान अधिकारी की जोंगा भी वहाँ ही रुकी हुई थी। नायक याद राम यादव ने मुझे बताया कि वह जगह नूरानाँग थी और उस समय वहाँ स्थित सेना के गोला-बारूद भण्डार की सुरक्षा के लिए हमारी यूनिट की गार्ड तैनात थी। उप-कमान अधिकारी वहाँ के गार्ड इंचार्ज जेसीओ (जूनियर कमीशंड आफिसर) से कुछ जानकारियाँ ले रहे थे और साथ साथ उनको निर्देश भी देते जा रहे थे। बातचीत का खास मुद्दा गार्ड के सदस्यों की छुट्टियों से जुड़ा था।
जो जवान उस समय डयूटी पर नहीं थे, उनमें लगभग सभी मेरे आने का पता लगने पर मुझ से आ कर मिले और हाल चाल पूछा। मुझे चाय पिलाई। मुझे अच्छा लगा था कि मैं मिलनसार वीर-अहीरों की यूनिट में शामिल होने जा रहा था।
वहाँ से विदा ले कर हमने फिर नीचे की ओर अपनी यात्रा जारी रखी। कुछ ही देर में एक मोड़ पर बाईं ओर सड़क से कुछ गज ऊपर लोहे अथवा लकड़ी के खंभों पर बहुत से झंडे दिखाई दिये। कुछ निर्माण कार्य भी दिखा। मुझे ऐसा लगा कि जैसे वहाँ कोई मंदिर हो।
मैंने नायक यादव से उस जगह के बारे में पूछने के लिये अपनी गर्दन उनकी ओर घुमाई ही थी कि उन्होने सड़क के किनारे पर गाड़ी खड़ी कर दी। मैं कोई सवाल पूछता उससे पहले ही वह कहने लगे, "बाबू जी, यह जसवंत गढ़ है। आइये जसवंत बाबा जी के दर्शन कर लें।" यह कह कर वह गाड़ी से नीचे उतर गए। मैंने 4 गढ़वाल राईफल्स के सूरमा राइफलमैन जसवंत सिंह की वीर गाथा पहले ही कहीं पढ़ रखी थी। भाग्य वश अपने आप को उस योद्धा की समाधी के सामने पाकर मेरा जिस्म रोमाँचित हो उठा था।
मैं अपनी सीट पर हतप्रभ बैठा चारों और नज़र दौड़ा कर उस स्थान का जायजा ले ही रहा था कि नायक यादव ने गाड़ी की मेरी तरफ वाली खिड़की थपथपाई, "सर, नीचे आ जाइए जो यहाँ आकर जसवंत बाबा जी के दर्शन नही करता वह जिंदा वापस मुड़ कर नहीं आता।" मैं चौंक पड़ा और तुरंत खिड़की खोल कर कूद कर नीचे आ गया क्योंकि मुझे शहीदों की समाधियों के प्रदेश से जिंदा वापस जो लौटना था।
"आईए, चलते हैं।" मैंने अपनी वर्दी की सिलवटें और बेल्ट ठीक करते हुए उनसे कहा।
‘चलिए।’
‘यादव, क्या आप राइफलमैन जसवन्त सिंह रावत जी की वीरगाथा के बारे में कुछ जानते है?’
"हां सर," नायक यादव ने समाधी की ओर अपने कदम बढ़ाते हुए कहा, "सन् 1962 की भारत-चीन जंग के दौरान चीनी फ़ौज ने सामने तवाँग की तरफ से इस ओर एक बहुत बड़ा हमला किया था। इस जगह पर फोर गढ़वाल राइफल्स का डिफेंस था। जसवंत बाबा ने अपने दो साथियों के साथ मिल कर राईफल और एलएमजी की मदद से भारी संख्या में आगे बढते हमलावर चीनियों को बहत्तर घण्टे तक रोके रखा था। वे इसी जगह पर शहीद हुए थे और उन्हें मरणोपराँत 'महावीर चक्र' दिया गया था।"
मैंने भी गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन के राइफलमैन जसवन्त सिंह के बारे में ऐसा ही पढ़ा था।
थल सेना के अधिकतर अंगों में निम्नतर रैंक को ‘सिपाही’ कहा जाता है। राजपुताना राइफल्स, जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स और गढ़वाल राइफल्स में इस रैंक को ‘राइफलमैन’ कहा जाता है। आर्म्ड कोर (टैंकों से सज्जित सेना) में ‘सवार’ कहते हैं। आर्टिलरी (तोपखाना) और आर्मी एयर डिफेंस में इसे ‘गनर’ से जाना जाता है तो सिग्नल कोर में सिग्नलमैन पुकारा जाता है।'ब्रिगेड ऑफ गार्ड्स' में इस रैंक जो 'गार्डसमैन' कहते हैं। इस तरह इस रैंक को विभिन्न शाखाओं में विभिन्न संबोधनों से बुलाया जाता है।
सिपाही अथवा इसके समकक्ष के ऊपर क्रमशः लांस नायक, नायक व हवलदार आते हैं। ये 'नॉन कमीशंड ऑफीसर्स' की श्रेणी में आते हैं। हवलदार और इससे नीचे वाले रैंकों को 'ओ आर' (अदर रैंक्स) के नाम से भी जाना जाता है। इन रैंकों के नाम लगभग सभी 'आर्म्स' और 'सर्विसेज' में एक से होते हैं। हवलदार के ऊपर नायब सूबेदार, सूबेदार, सूबेदार मेजर के रैंक आते हैं। आर्म्ड कोर में इन्हें क्रमशः नायब रिसालदार, रिसालदार और रिसालदार मेजर कहा जाता है। ये 'जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स' कहलाते हैं। सन् 1965 से पहले नायब सूबेदार अथवा नायब रिसालदार को 'जमादार' कहा जाता था। सूबेदार मेजर अथवा रिसालदार मेजर से लेकर नीचे सिपाही अथवा उसके समकक्षों को 'पीबीओआर' (पर्सन्स बिलो ऑफिसर्स रैंक) भी कहते हैं।
— भगत राम मंडोत्रा
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