12. अपनी जान किसको प्यारी नहीं होती!




अपनी जान किसको प्यारी नहीं होती! 

 

सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान राइफलमैन जसबंत सिंह रावत सेला की रक्षा के लिए तैनात गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन में शामिल थे। उस समय चौथी गढ़वाल राइफल्स, 62 इन्फेंट्री ब्रिगेड की कमान में चीनी सेना से लड़ी थी। प्रसिद्ध ब्रिगेडियर होशियार सिंह तब 62 इन्फेंट्री ब्रिगेड के कमांडर थे।  तवाँग की तरफ से आगे बढ़ रही चीनी सेना के साथ चौथी गढ़वाल राइफल्स के बहादुर जवानों ने डटकर लोहा लिया था। यह पूर्वी युद्ध क्षेत्र में एक मात्र बटालियन थी जिसने चीनी सेना के दाँत खट्टे किये थे और जिसे बैटल ऑनर ‘नूरानाँग’ से नवाजा गया था।


मैं और नायक यादव, राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, महावीर चक्र, की समाधि पर गए और उन्हें सेल्यूट किया। तवाँग और उससे आगे स्थित भारत-चीन सीमा तक पहुंचने के लिए, इस एक मात्र सड़क मार्ग से हो कर गुजरने वाले अफ़सर और अन्य रैंक शहीद राइफलमैन जसवंत सिंह रावत को सम्मान देने के लिए यहाँ पर ज़रूर रुकते हैं। एक किंवदंती के अनुसार अगर कोई इस समाधि को सम्मान दिए बिना आगे जाता है तो वह वापस लौट कर नहीं आता। इस सड़क मार्ग के दोनों ओर कई स्थानों पर लगीं पाषाण पट्टिकाओं पर उन लोंगों के नाम भी लिखे दिख जाते हैं जो इस दुर्गम क्षेत्र में समय-समय पर विभिन्न दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं। सम्भवतः इस किंवदंती के पीछे यही कारण रहा है। और फिर अपनी जान किसको प्यारी नहीं होती! 


राइफलमैन जसवंत सिंह रावत की समाधि से कुछ गज पहले दो-तीन मध्यम आकार के सूचनापट लगे हुए थे जिनमें उस क्षेत्र में हुई लड़ाई का संक्षिप्त वृत्ताँत और शहीदों के नाम दर्ज थे। उस समय अर्थात् जुलाई सन् 1989 में उस जगह पर स्थित एक छोटे से पुराने बंकर में उनकी वर्दी तथा उनके द्वारा प्रयुक्त कुछ वस्तुएं रखी थीं। अच्छी तरह से प्रेस की हुई वर्दी पर सूबेदार मेजर के रैंक लगे हुए थे। जहाँ तक मुझे याद है उस समय बंकर के सामने एक छोटा सा पक्का चबूतरा था उस पर शिवलिंग अथवा शिव भगवान की मूर्ति थी। चबूतरा टिन से छाया हुआ था। मैंने चबूतरे पर पाँच रुपए चढ़ा कर माथा टेका और अपने परिवार सहित अपनी सलामती के लिए भगवान से प्रार्थना की थी। वहाँ उपस्थित जवान ने प्रसाद के कुछ दाने हमारी हथेलियों पर रख दिए थे। 


एक सूचना पट पर कुछ इस प्रकार लिखा हुआ था -


“राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, महावीर चक्र की याद में, जिन्होंने, स्वेच्छा से, 17 नवंबर 1962 को ए कंपनी, चौथी बटालियन गढ़वाल राइफल्स के हिस्से के रूप में, लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाँईं की सहायता से, अपनी रक्षा पंक्ति के नजदीक आई हुई, कारगर फायर करती शत्रु की मीडियम मशीन गन को शाँत किया था। उस दिन चौथी गढ़वाल राइफल्स ने उस स्थान पर  हुए दुश्मन के दो हमलों को असफल किया था। जसवंत सिंह रावत और गोपाल सिंह गुसाँईं ने, त्रिलोक सिंह नेगी के कवरिंग फायर की सहायता से, बड़े साहस के साथ शत्रु की एम.एम.जी की तरफ ग्रेनेड फेंकने तक की दूरी तय की, और पाँच चीनी सैनिकों की टुकड़ी को तबाह कर के उनकी एम.एम.जी छीन ली पर वापस लौटने की प्रक्रिया के दौरान जसवंत रावत और त्रिलोक नेगी शहीद हो गए। गोपाल गुसाँईं, यद्यपि गंभीर रूप से घायल हो चुके थे, शत्रु की छीनी हुई एम.एम.जी के साथ वापस लौटने में सफल हुए थे  पूरे अभियान में 300 चीनी सैनिक मारे गए अथवा घायल हुए जबकि गढ़वाल राइफल्स के 2 सैनिक शहीद हुए और 8 घायल हुए थे।” 


उस समय उस समाधि की देखरेख के लिए वहाँ पर 2-3 सैनिक रहते थे। राइफलमैन जसवंत सिंह रावत, महावीर चक्र को दिन में समय-समय पर चाय व भोजन परोसा जाता और रात को बाक़ायदा उनका बिस्तर लगाया जाता। 


राइफलमैन जसवंत सिंह रावत के बारे में कई दन्त कथाएं प्रचलित हैं जिनमें एक किंवदंती यह भी है कि उन्होंने दो स्थानीय लड़कियों, जिनके नाम सेला और नूरा थे, के सहयोग से चीनी सेना को रोके रखा था।  पर यह सच प्रतीत नहीं होता है  क्योंकि से-ला और नूरानांग वहाँ जगहों के नाम है जो 1962 के युद्ध से पहले से चले आ रहे हैं। 


अब जसवंत गढ़ में एक भव्य युद्ध स्मारक बन गया है।


— भगत राम मंडोत्रा 

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