14. और मैं तवाँग जा पहुंचा

 

और मैं तवाँग जा पहुंचा 


जसवंत गढ़ से नीचे की ओर जंग नामक स्थान आता है। जंग तवाँग-चू के किनारे पर बसा एक गाँव है। यहाँ पर तवाँग-चू बहुत नीचे खाई में बहती नज़र आती है। इस स्थान में वहाँ के मूल वासियों की आबादी है। जंग, से-ला से तवाँग की ओर लगभग 44 किलोमीटर दूर उतराई में नीचे की तरफ पड़ता है। 


जंग के नजदीक गुजरती हुई सड़क से लगभग आधा किलोमीटर ऊपर की ओर नूरानाँग झरना है। यहाँ पर नूरानाँग नदी, से-ला (दर्रे) की उत्तरी ढलान से निकल कर नूरानाँग होती हुई, लगभग 100 मीटर की ऊंचाई से गिर कर, तवाँग-चू (नदी) में मिलती है। यह बहुत बड़ा झरना देखते ही बनता है।  अरुणाचल प्रदेश में नूरानाँग वॉटरफॉल को बोंग बोंग भी कहा जाता है। यह भारत के सबसे खूबसूरत झरनों में से एक है। सुना है अब वहाँ एक छोटा हाइड्रो पावर प्लाँट भी बन गया है। राकेश रोशन द्वारा सन् 1997 में निर्मित शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित द्वारा अभिनीत ‘कोयला' फिल्म के एक दृश्य में भी इस झरने की एक झलक देखने को मिलती है। इसे जंग का झरना भी कहते हैं। जंग से तवाँग जाने के लिए थोड़ी दूरी पर तवाँग-चू पर एक छोटा पुल पार करना पड़ता है। उस समय वह पुल संकरा सा था। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, चीनी सेना का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए, इस पुल को भारतीय सेना द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था।  


तवाँग जंग से लगभग 29 किलोमीटर की दूरी पर दूसरी ओर ऊंचाई पर स्थित है। तवाँग-चू का पुल पार करने के कुछ देर बाद आबादी शुरू हो जाती है। तवाँग से कुछ दूर पहले बोमड़ीर आता है। उस समय तवाँग जाने वाले सेना की गाड़ियों के काफले बोमड़ीर में ही रुकते थे और वहीं से ही वापिस असम के तेजपुर और गुहाटी लौटने वाली सैनिक गाड़ियाँ चला करतीं थीं। 


हमारी गाड़ियाँ तवाँग बाजार के बाहर-बाहर से होती हुईं लगभग 2 किलोमीटर ऊपर चढ़ाई पर स्थित ‘चूजे जीजी' नामक स्थान पर जा  कर खड़ी हो गईं।  नायक यादव ने मुझे बताया कि हम मंजिल पर पहुंच चुके थे। यहाँ पर मेरी नई रेजिमेंट का ‘रियर' (पिछला भाग) स्थित था। रेजिमेंट की गाड़ियों के बेड़े के साथ चालक दल उसी स्थान पर रहता था। रेजिमेंट का मुख्य अग्रिम भाग आगे लुम्पो नामक स्थान में था और एक बैटरी लुम्पो से भी आगे नीलिया में तैनात थी। 


मेरी नई यूनिट का मुख्य कार्य सेना के पाँचवें माउंटेन डिवीज़न के अधीन 77 माउंटेन ब्रिगेड (चिंडिट) की  भारत-चीन सीमा पर स्थित तीन इन्फेंट्री बटालियनों को, ज़रूरत पड़ने पर, आर्टिलरी फायर स्पोर्ट देना था।  उस समय लुम्पो सड़क मार्ग से तवाँग से जुड़ा हुआ नहीं था।  तवाँग से संकरी सी एक सड़क लुम्पो से तीन-चार किलोमीटर पीछे घुरसम नामक स्थान तक ही जा पाती थी। उस सड़क पर मात्र जीप/जोंगा और छोटे ट्रक वन टन ही मुश्किल से आवाजाही कर पाते थे क्योंकि वह सड़क कच्ची और उबड़-खाबड़ भी थी। इसी बजह से यूनिट की गाड़ियों का मुख्य बेड़ा तवाँग के ऊपरी भाग चूजे जीजी में रखना पड़ता था। 


अरुणाचल प्रदेश में बहुत से स्थानों के नामों के साथ जीजी जुड़ा हुआ मिलता है जैसे कि चूजे जीजी। जीजी अंग्रेजी भाषा के शब्दों ‘ग्रेजिंग ग्राउंड' का छोटा रूप है जिनका अर्थ है—चारागाह अर्थात ये स्थान याकों की चारागाह होते हैं। 


सेना की हर टुकड़ी (यूनिट) को नेतृत्व और प्रबंधन के लिए पिरामिड नुमा ढाँचे में संगठित किया जाता है। प्रायः सभी प्रकार की टुकड़ियों की सबसे छोटी इकाई अनुभाग (सेक्शन) होती है। उसके ऊपर की इकाई को  विभिन्न प्रकार की सैनिक टुकड़ियों में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे टैंकों से सज्जित सेना (आर्म्ड कोर) में और बड़ी तोपों से सज्जित सेना (आर्टिलरी) में सेक्शन के ऊपर ट्रूप होता है जिसमें एक से अधिक अनुभाग (सेक्शन) होते हैं। पैदल सेना (इन्फेंट्री) में इस इकाई को प्लाटून के नाम से सम्बोधित किया जाता है। ट्रूप अथवा प्लाटून के ऊपर आर्म्ड कोर में ‘स्क्वाड्रन’ होता है, आर्टिलरी में ‘बैटरी’ होती है और इन्फेंट्री में ‘कंपनी’ होती है। इसके ऊपर रेजिमेंट अथवा बटालियन होती है। 


उप-कमान अधिकारी महोदय सड़क के ऊपर की तरफ यूनिट के अफसरों के लिए बने बंकरनुमा आवास में चले गए।  मुझे सड़क के नीचे की ओर एक झोंपड़े के पिछले भाग के अंदर अपना सामान ले जाने के लिए कहा गया। मैंने देखा उस झोंपड़े को टिन की चादरें लगा कर दो भागों में बांटा गया था। झोंपड़े का पिछला भाग लगभग उसका एक चौथाई भाग था जिसका दरवाज़ा सड़क की ओर खुलता था। अगला तीन चौथाई भाग तवाँग बाजार और तवाँग के प्रसिद्ध बौद्ध मठ की दिशा में खुला था और उसमें तिरपाल बिछा था। मैंने देख कर अंदाजा लगाया कि यह सैनिकों के लिए समय-समय पर चलने वाली कक्षाओं के लिए काम आता होगा। 


मैं अपने ठहरने के स्थान का निरीक्षण कर ही रहा था कि उसी रेजिमेंट में सेवारत सेना शिक्षा कोर के एक हवलदार भी अपना सामान लेकर वहाँ मेरे पास आ गए। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें मेरे साथ ठहरने के लिए भेजा गया है।  वहाँ पर किसी का अकेले रहना, बिशेषकर रात को, सुरक्षित नहीं माना जाता था।  इसीलिए उन्हें मेरे साथ रहने के लिए भेजा गया था।  बैसे भी सेना में ‘साथी व्यवस्था' (Buddy system) होती है। हर सैनिक का एक जोड़ीदार होता है जो सुख-दुख में, खास करके युद्ध में भाग लेते समय, उसका साथ देता है।  


एक दूसरे का परिचय पाकर हम कुछ ही देर में मित्र बन गए। मैं उनको ‘मास्टर जी’ करके संबोधित करता और वो मुझे ‘बाबू जी’ कह कर पुकारते। मास्टर जी हरियाणा के रहने वाले थे।  उस समय तवाँग में बिजली की व्यवस्था नहीं थी। हमने रम की खाली बोतल के ढक्कन में छेद करके उसमें फटे कपड़े की बत्ती बना कर डाल दी। इस तरह बोतल में मिट्टी का तेल भर कर ज़रूरत पड़ने पर रात में  रोशनी करने का इंतज़ाम हो गया। 


— भगत राम मंडोत्रा 

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