15. तवाँग में बोफोर्स तोपें



तवाँग में बोफोर्स तोपें


तवाँग के ऊपरी भाग अर्थात् चूजे जीजी में स्थित अपनी पलटन के पिछले भाग में पहुंच कर वहाँ की रोजमर्रा की समय सारणी के अनुसार दूसरे दिन प्रातःकाल 6 बजे हमें शारीरिक प्रशिक्षण हेतु एकत्रित होना था। जो लोग पहले से वहाँ पर रह रहे थे उन्हें हल्की दौड़ लगाने के आदेश मिले जबकि मुझ जैसे नवागंतुकों को 40-45 मिनट टहलने के लिए कहा गया। अति ऊंचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में जाने से पहले शरीर को वहाँ के तापमान व माहौल के अनुरूप ढालना आवश्यक होता है। एक निर्धारित अवधि तक शारीरिक गतिविधि कार्यक्रम  पूरा करने के उपराँत डॉक्टर द्वारा सैनिकों का शारीरिक परीक्षण किया जाता है। पूर्णतः फिट पाए जाने पर ही आगे जाने की अनुमति प्राप्त होती है। 


हम दोनों को अपना खाना लेने के लिए भोजन-पाकशाला में जाना पड़ता था। चाय समय-समय पर कोई सैनिक आकर दे जाता था — प्रातः लगभग पाँच बजे तदोपराँत ग्यारह बजे और फिर दोपहर बाद लगभग तीन बजे।  जहाँ हम ठहरे थे वहाँ से थोड़ी दूर नीचे दाईं ओर तवाँग का प्रसिद्ध बौद्ध मठ दिखाई देता था और बाईं ओर भारतीय सेना के 5वें पर्वतीय डिवीजन का मुख्यालय था। डिवीजन मुख्यालय के ऊपर की ओर एक हैलीपैड था।


सुबह जब हम चूजे जीजी के ऊपर की ओर चहलकदमी करने गए तो वहाँ बोफ़ोर तोपों की एक बैटरी नज़र आई। एक बैटरी अर्थात् 6 तोपें। मास्टर जी ने बताया था कि वो तोपें चीनी सेना, जिसका नाम पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.ए) है, की आखों में खटकती थीं। चीनी सेना वूमला में होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में उन तोपों को पीछे हटाने की बात करती थी। एक तोपखाना रेजिमेंट में 4 बैटरियाँ होती हैं। जिनमें एक प्रशासनिक बैटरी होती है जिसे हैडक्वाटर बैटरी कहा जाता है। शेष तीन लड़ाकू बैटरियाँ होतीं हैं जिनके नाम ‘पी’ (पापा) ‘क्यू’ (क्यूबेक) और ‘आर’ (रोमियो) होते हैं। इन्फैंट्री बटालियन में इनकी समकक्ष कम्पनियाँ होती हैं जिनके नाम ए, बी, सी, डी (अल्फा, ब्रावो, चार्ली, डेल्टा) इत्यादि होते हैं। तोपखाना रेजिमेंट की प्रत्येक लड़ाकू बैटरी में 6 तोपें होती हैं। भारत-चीन सीमा पर सामान्य परिस्थितियों में समय-समय पर दोनों देशों की सेनाओं के प्रतिनिधि अफसरों की फ्लैग मीटिंग होती रहती हैं जिनमें छोटे-मोटे मुद्दों व मतभेदों पर चर्चा करके समाधान खोजा जाता है। 


वापस आकर हमने ब्रेक-फ़ास्ट किया और गपशप मारी। मैंने मास्टर जी को बताया कि मुझे तवाँग बाजार जाकर एक रंगीन कैमरा खरीदना है। सेना में उन दिनों कैमरा रखने वालों और डायरी लिखने वालों का रिकॉर्ड रखा जाता था। 


मुझे सैन्य क्षेत्र से बाहर जाना था। उस के लिए मुझे ऑउट पास की आवश्यकता पड़नी थी। परंतु हम दोनों वहाँ वरिष्ठ हवलदार थे अतः मैं मास्टर जी को सूचित कर नीचे तवाँग बाजार गया और 100 रुपए के आसपास ‘प्रीमियर’ ब्राँड का साधारण रंगीन कैमरा खरीद लाया। वो मेरा दूसरा कैमरा था पहला कैमरा अगफा क्लिक III था।  ये दोनों कैमरे मेरे घर के किसी कोने में आज भी पड़े मिल जाएंगे। उस समय डिजिटल कैमरों का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था। उस कैमरे से वहाँ खींची गई तस्वीरें अब धुंधली हो गयी हैं। नीचे उस कैमरे से ली गई तस्वीर को स्कैन करके अवलोकनार्थ डाला गया है। ये है तब के तवाँग के ऊपरी भाग में स्थित चूजे जीजी का एक दृश्य। मेरे दाईं ओर पीछे एक बंकर दिख रहा है। इस पुराने बंकर के अंदर जाकर मैं यह सोच कर रोमाँचित हो रहा था कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में हमारे योद्धा इस बंकर से लड़े होंगे।

 

तवाँग में 5-6 दिन तक अपने शरीर को अति ठंड और ऊंचाई के वातावरण में ढालने और डॉक्टरी परीक्षण में सही पाए जाने के बाद ही मुझे, अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग जो लुम्पो में स्थित था, में शामिल होने के लिए आगे की यात्रा आरम्भ करनी थी। हर सुबह हम घूमने और हल्का दौड़ने के लिए निकलते थे। उस समय तक बोफ़ोर तोपें खरीद में हुई धांधली के विवाद में घिर चुकीं थी। दरअसल ये 155 मिलीमीटर तोपें सेना के मध्यम तोपखाने की क्षमता को बढ़ाने के लिए खरीदी गईं थीं। विवाद में घिरने के बाद इनके कल-पुर्जे उपलब्ध नहीं हो पाए अतः इन तोपों से लैस हर रेजिमेंट में एक दो तोपों को खोल कर उनके कल-पुर्जों से  दूसरी तोपों को काम करने के लिए दुरुस्त रखा गया। बाद में कारगिल युद्ध के दौरान हमारे तोपचियों ने इन तोपों का संचालन बड़ी कुशलता के साथ किया और सराहनीय परिणाम प्राप्त किए। सोलह-सत्रह हजार फुट से अधिक ऊंचे कारगिल के पहाड़ों पर गोले गिरा कर पाकिस्तानी सैनिकों को रक्षात्मक स्थिति में रहने के लिए बाध्य करने वाली इन तोपों ने हमारे इन्फैंट्री के जवानों की महत्वपूर्ण सहायता की थी। अगर उस समय बोफोर तोपें न होतीं तो कारगिल की जंग को जीतना हमारी सेनाओं के लिए और अधिक कठिन हो जाता। अपने समय में हमारे तोपखाने में अधिक ऊंचाई तक गोले दागने वाली ये एक मात्र तोप रही है।  इसके बैरल का उठान सत्तर डिग्री तक संभव है और इसकी गोला दागने की क्षमता चौबीस किलोमीटर तक है। कई दशकों से चली आ रही बेहतरीन ढंग से आजमाई हुईं सोवियत यूनियन से खरीदी गई 130 मिलीमीटर एम-46 तोपों की अपनी सीमायें हैं। इनके बैरल का उठान मात्र पैंतालीस डिग्री है पर इनकी गोला फेंकने की क्षमता 27 कि. मी. तक है। 


सेनाओं के लिए हथियार खरीदने में हमेशा धांधली होती रही है।  रफाल लड़ाकू विमान की ख़रीद भी विवादों में घिर गई थी। भारतीय सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार एड्स की तरह फैल गया है। फिलहाल इसका कोई उपचार संभव नहीं दिखता क्योंकि अक्सर सत्ता के ठेकेदार ही इसमें संलिप्त पाए जाते हैं। ये हमारे देश की वायुसेना का सौभाग्य है कि रफाल का हश्र बोफ़ोर तोपों जैसा नहीं हुआ। 


अगले दिन सुबह जब हम घूमने गए तो मुझे एक दूसरी तोपखाना यूनिट के वही जवान मिल गए जिनसे मुझे वीरपुर में उनके मराठा कमान अधिकारी की उस क्षेत्र में सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाने की खबर मिली थी।  मुझे अपने परिचित कर्नल अनिल दामोदर धरप की असमय मृत्यु की सूचना से बहुत दुःख हुआ था अतः मैं उस दिन उन जवानों से अधिक बात नहीं कर पाया था। तवाँग में बातों ही बातों में जब मैंने उनसे पूछा कि अब उनके नए सीओ कौन हैं तो उन्होंने बताया कि उनके उप-कमान अधिकारी पदोन्नत हो कर कर्नल रैंक में कमान अधिकारी बन गए थे। कर्नल तीर्थ सिंह, वीर चक्र को मैं जानता था। वह पठानकोट की तरफ के  रहने वाले एक डोगरा अफसर थे। उन्हें वीरचक्र 1971 के भारत-पाक युद्ध में बहादुरी के साथ दुश्मन का मुकाबला करने के लिए मिला था। उस समय वह कैप्टन थे।  उनके साथ जुड़ी हुई एक घटना की याद ताजा हो गई।


(....अगली कड़ी में)


— भगत राम मंडोत्रा




    

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