16. क्या मेले में घूमने आये हो?
क्या मेले में घूमने आये हो?
थल सेना में पदोन्नति के लिए कोई न कोई काडर क्लास, कोर्स अथवा परीक्षा पास करनी होती है। ये शर्त सभी अफसर, जेसीओ तथा अन्य रैंकों पर लागू होती है। अफसरों को पदोन्नति परीक्षाएं भाग ‘बी’ और ‘डी’ इत्यादि पास करना पड़ती हैं। सभी आर्म्स और सर्विसेज में जेसीओ तथा अन्य रैंकों के लिए पदोन्नति नियम प्रायः एक जैसे ही होते हैं। तोपखाना में एक गनर को लाँस नायक अथवा नायक बनने के लिए अन्य शर्तों के अतिरिक्त एक पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर क्लास पास करनी पड़ती है। उसी तरह नायक से हवलदार और हवलदार से नायब सूबेदार की पदोन्नतियों के लिए अन्य शर्तों के साथ अलग-अलग काडर क्लास पास करने होते हैं।
सन् 1980 से पहले जेसीओ तथा अन्य रैंकों को पदोन्नति के बहुत कम मौके मिलते थे। 1980 में जब जनरल ओ.पी. मल्होत्रा के सेनाध्यक्ष कार्यकाल में हुए काडर रिव्यू को लागू किया गया तो धड़ल्ले से पदोन्नतियों के द्वार खुल गए। नई प्रमोशन पॉलिसी के अनुसार एक गनर को प्रमोट होने के लिए पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर क्लास पास करना ज़रूरी था। ज्यादातर ट्रेडों का प्रमोशन युनिट में ही होता था पर मेरे ट्रेड का प्रमोशन आर्टिलरी रिकॉर्ड से कंट्रोल होता था। पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर क्लास पास किए बगैर ही मार्च सन् 1981 में मुझे लाँस नायक बनाने के लिए ऑर्डर आ गए।
मैंने पदोन्नति की नई शर्तें ध्यान से पढ़ीं तो उसमें लिखा पाया कि लाँस नायक/नायक बनने के लिए पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर क्लास पास करना लाजिमी था। उसके बिना ही मैं लाँस नायक बन गया था अतः मैंने उसका निष्कर्ष यह निकाला कि अगली पदोन्नति अर्थात् नायक बनने के लिए मुझे वह काडर क्लास पास करना ज़रूरी था।
उस समय मैं भारतीय सेना के तोपखाने की 109 वायु रक्षा रेजिमेंट में तैनात था। उस रेजिमेंट में उस समय मेरे ट्रेड के चार और गनर थे जो मेरे साथ लाँस नायक बने थे। उन्होंने उसका अर्थ ये निकाला कि क्योंकि वे लाँस नायक बन गए थे इस लिए उन्हें उस काडर क्लास को पास करने की ज़रूरत नहीं थी। उच्चाधिकारी गण भी इस से सहमत थे। पलटन में सभी ट्रेडों के लिए उस काडर की कक्षाएं शुरू होने वाली थीं। मैंने अपने बैटरी कमाँडर से बात की उन्होंने मुझे कक्षाओं में शामिल होने की आज्ञा दे दी पर साथ में यह हिदायत भी दे डाली कि दिन की कक्षाएं समाप्त करने के बाद मुझे अपना सामान्य कार्य शाम को या रात को पूरा करना था।
मैं उहापोह में था उन कक्षाओं में उपस्थित होऊं या न होऊं। मुझे पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर क्लास पास करना जरूरी है या नहीं, इस प्रश्न का उत्तर हमारे तोपखाना अभिलेखागार के पास था पर उनको कोई चिट्ठी लिख कर पूछने के लिए तैयार ही नहीं था क्योंकि उच्चाधिकारियों समेत दूसरे लोगों को इस विषय में कोई शंका ही नहीं थी। ऐसे मामलों मे सेना में व्यक्तिगत पत्र लिखने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। कक्षायें शुरू होने का दिन आ गया। मैं ऑफिस में अनमना सा हो कर काम कर रहा था। तभी वहाँ हमारे बैटरी सीनियर जेसीओ सूबेदार अमर सिंह थापा साहब मेरे पास आए। वो धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश के रहने वाले थे। आते ही बोले, “ओ मुन्नु, तैं पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर ताँईं अपणा नाँ दित्तेह्या। तू क्लास अटेंड करना नीं गिया? (ओ लड़के, तूने पोटेंशियल एन.सी.ओज काडर के लिए अपना नाम दिया था। तू क्लास अटैंड करने नहीं गया?)”
“नहीं सर मुझे ये काडर क्लास लागू नहीं”, मैंने उन्हें जवाब दिया।
“लागू क्यों नहीं? अपना काम बंद करो और फौरन क्लास में जाओ, अभी।” उन्होंने सख्त लहजे में आदेश दिया और मैं कक्षाओं में शामिल हो गया। उन कक्षाओं में शामिल होने से जो प्रशिक्षण मैंने सैन्य जीवन के आरम्भ में लिया था उसकी दोहराई हो गई। वो कक्षाएं लगभग डेढ़ मास तक चलीं। मैने उसकी परीक्षा अच्छे नंबर लेकर उत्तीर्ण की। सेना से संबंधित सभी विषयों पर अच्छी पकड़ हो गई जो 32 वर्ष की सैन्य सेवा में काम आई।
जैसे ही उस परीक्षा का परिणाम तोपखाना अभिलेखगार में पहुंचा, मेरी पदोन्नति के आदेश जारी हो गए। मैं 'नायक' बन गया। बाकी के चार लाँस नायकों का प्रमोशन रुक गया। उनके लिए फिर से कक्षाएं चलाई गईं पर वह हमेशा के लिए मेरे से जूनियर हो गए थे।
तदोपराँत जब नायक से हवलदार की प्रोन्नति के लिए परीक्षा पास करने का समय आया तो हम पांचों को बिना परीक्षा के ही पास कर दिया गया और आवश्यक काग़ज़ी कार्रवाई निभा दी गई। इसके पीछे मुख्य कारण यह था कि जो उन चार गनरों के साथ हुआ था यूनिट उसकी पुनरावृत्ति नहीं होने देना चाहती थी और दूसरा कारण यह था कि निर्धारित अवधि के लिए कक्षाएं आयोजित की जातीं तो यूनिट के कार्यालयों के कामकाज में व्यवधान पड़ना था।
उन चार तोपचियों को अभी भी उम्मीद थी कि उनकी वरीयता कायम रहेगी। या तो उनको पता ही नहीं था कि अफसरों और अफसरों से निचले रैंकों के वरीयता नियम अलग अलग होते थे या फिर उनको इस बात का ज्ञान था पर वह अपने आप को तसल्ली देने के लिए सच्चाई मानने को तैयार नहीं थे। अफसरों की वरीयता सामान्यतः उनकी कमीशन की तारीख से निर्धारित होती है। एक सिपाही की वरीयता भी इसी तरह सामान्यतः उनके भर्ती होने की तिथि से तय होती है पर नायक से लेकर सूबेदार मेजर के रैंक तक की वरीयता उनके वर्तमान रैंक की तिथि से निर्धारित होती है।
अप्रैल 1983 में हवलदार बनने के उपराँत 1985 में मेरा तबादला राजस्थान में तैनात एक तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय में हो गया। तब तक मेरी सैन्य सेवा दस वर्ष हो गई थी अतः मैं हवलदार से नायब सूबेदार प्रमोशन परीक्षा के लिए पात्र बन गया था। मैंने इस संबंध में जब लेफ्टिनेंट कर्नल रैंक के अपने उच्चाधिकारी से बात की तो उन्होंने मुझे बताया कि मैं अपना नाम इस प्रयोजन के लिए चलने वाली कक्षाओं के लिए भेज दूं और कक्षाओं में शामिल हुए बिना परीक्षा वाले दिन परीक्षा दे कर आ जाऊं। वो कक्षाएं लगभग डेढ़ महीने तक चलीं और परीक्षा का दिन आ गया। लेफ्टिनेंट कर्नल तीर्थ सिंह, वीर चक्र परीक्षा के लिए गठित बोर्ड के अध्यक्ष थे।
सुबह 6 बजे से निर्धारित जगह पर परीक्षा शुरू होनी थी। मैं भी वहाँ पहुंच गया। अध्यक्ष महोदय ने सभी परीक्षार्थियों को बिधिवत एकत्रित किया और आदेश दिए कि सबसे पहले “युद्ध शारीरिक क्षमता परीक्षा” ली जाएगी। उस समय यह परीक्षा सैनिक साजो सामान के साथ दो मील की दौड़ होती थी जिसे निर्धारित अवधि में तय करना होता था। उसके अतिरिक्त और भी टेस्ट होते थे जैसे ‘मंकी रोप’, 9 फुट गड्ढा, फायर-मैन लिफ्ट, 100 मीटर शटल रेस इत्यादि। दौड़ने का आदेश मिलते ही कमान से छूटे तीर की तरह सभी निकल गए पर मैं खड़ा रहा। जैसे ही लेफ्टिनेंट कर्नल तीर्थ सिंह, वीर चक्र की नजर मुझ पर पड़ी उन्होंने जोर से कहा, “दौड़ क्यों नहीं रहे हो? भागो, फेल हो जाओगे।”
“सर, मेरे पास हथियार नहीं है उसके बिना कैसे दौडूं?”
“क्या मेले में घूमने आए हो?” उन्होंने ऊंची आवाज में पूछा। साथ ही उन्होंने सामने बने “फायर प्वाइंट” की ओर इशारा किया “उधर से एक गैंती उठाओ और भाग जाओ”।
मैंने लपक कर एक गैंती उठाई और उसे कंधे पर रख कर बन्दूक से छूटी गोली की तरह निकल भागा। गैंती नई थी। उसका मोटा दस्ता लाल, लोहा काला और नुकीले हिस्से सिल्वर पेंट किये हुए लगते थे। उसका वजन राइफल से कम नहीं था। मुझे राइफल की जगह गैंती उठा कर भागते देख रास्ते में मिलने वाले फौजी और सिविलियन हंस रहे थे। मैं द्वापर के बलराम की तरह हलधर बन गया दिखता था।
सेना में मेरा हथियार कार्बाइन मशीन 9 एम एम रहा जिसे आम भाषा में स्टेन गन भी कह देते हैं। यह राइफल से छोटा और कम बजन का होता है। उस दिन मैं यह सोच कर अपने हथियार को साथ नहीं लाया था कि हथियार कवायद तो राइफल के साथ होती है कार्बाइन मशीन के साथ नहीं। मैंने सोच रखा था कि अगर मुझे राइफल के साथ कवायद का टेस्ट देना पड़ा तो किसी दूसरे से राइफल ले लूंगा। दौड़ भी लगानी पड़ेगी ये मैंने सोचा ही नहीं था।
मैंने वो टेस्ट “गुड” श्रेणी में पास किया था। मैं इस टेस्ट में “ एक्सीलेंट” श्रेणी में आता था पर उस दिन देरी से जो दौड़ा था।
— भगत राम मंडोत्रा
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