2. प्रयास―कठिनाइयों की चाबी

 



प्रयास―कठिनाइयों की चाबी


दिए गए आश्वासन के अनुसार दूसरे दिन प्रातः लगभग 10 बजे उप-कमान अधिकारी महोदय ट्रांजिट कैम्प में आए थे। उन्होंने कैम्प के अफ़सर कमांडिंग से बात करके मुझे कैम्प से निकाल लिया था और अपने साथ हेलिकॉप्टरों वाली यूनिट में ले गए थे।  असम में बरसात की गर्मी आर्द्रता की अधिकता के कारण बड़ी चिपचिपी होती है। उमस बेचैनी पैदा करती है।  ट्रांजिट कैम्प में बिताई गई पिछली रातें बहुत कष्टदायक रही थीं क्योंकि एक तो भीषण गर्मी और दूसरा मेरे नज़दीक कोई छत का पंखा भी नहीं था। नई जगह पर अपनी चारपाई के ऊपर पंखा घूमता देख बहुत सुकून मिला था। 


शाम को उप-कमान अधिकारी साहब का मुझे संदेश मिला था।  मुझे अगले दिन उनके साथ मिसामारी में बिखरे यूनिट के सैनिकों से मिलने जाना था जिनका विवरण मेरे द्वारा ट्रांजिट कैम्प में तैयार की गई सूची में था। हम गए पर जवानों से मिलने का हमारा प्रयास सफल नहीं हो पाया था क्योंकि जब तक हम वहां पहुंचे उन्हें उससे पहले ही ब्रेकफास्ट करने के बाद अलग अलग कामों के लिये अलग अलग स्थानों में भेजा जा चुका था।  पर ये तसदीक हो गया कि वे वहां थे।  उस दिन, रात के खाने के बाद, उप-कमान अफ़सर महोदय ने मुझे सूचित किया था कि अगली सुबह वो ‘चीता’ हेलीकॉप्टर से तवांग के लिए रवाना होने वाले थे और दो-तीन दिन के अंदर मेरा भी हवाई मार्ग से तवांग जाने का बंदोबस्त होने वाला था। 


अगली सुबह उन्होंने मिसामारी हवाई पट्टी से उड़ान भरी थी। यह हवाई पट्टी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेनाओं के लिए रसद  पहुंचाने के लिए बनाई गई थी। उन्हें विदा करके हम दो-तीन जवान हवाई पट्टी के किनारे गप-सप मारने लग पड़े थे। लगभग 25-30 मिनट के उपरांत एक ‘चीता’ आ कर हमारे ऊपर मंडराने लगा था। उसके ज़मीन पर उतरने के उपरांत हमने देखा उप-कमान अधिकारी दो पायलटों के साथ हेलीकॉप्टर से नीचे उतर रहे थे। उन्होंने बताया था कि 'सेला' पर घने बादलों के कारण 'चीता’ को वापस लाना पड़ा। 'चीता' एक छोटा सा हेलीकाप्टर होता था जिसके यन्त्र और कल-पुर्जे घने बादलों में उड़ान भरने में सक्षम नहीं थे।  अरुणाचल प्रदेश में ‘ला’ का मतलब दर्रा/पहाड़ और ‘चू’ का अर्थ नदी होता है। जैसे बोमडीला, सेला, टेंगाचू, तवांगचू इत्यादि।  'सेला' दर्रा समुद्र तल से लगभग 13700 ऊँचा है और तवांग जाने के लिए उसे पार करना पड़ता है। उप-कमान अधिकारी महोदय की बर्दी पर लगे निशानों से पता चलता था कि वो हेलीकॉप्टर के प्रशिक्षित पायलट भी थे। 


उप-कमान अधिकारी महोदय को भी अरुणाचल प्रदेश जाने की जल्दी थी क्योंकि उसी दौरान यूनिट के कमान अधिकारी छूटी पर अपने पंजाब स्थित घर निकल गए थे। उन्होंने ब्रिगेड कमांडर महोदय से बिशेष आज्ञा लेकर अरुणाचल प्रदेश में गाड़ियों के लिए बंद पड़ी सड़क को मिसामारी तक पैदल चल कर पार कर लिया था।  नियमों के अनुसार हर समय इन दोनों अधिकारियों में से एक को यूनिट के साथ होना ज़रूरी था। 


उन दिनों अरुणाचल प्रदेश में मौसम खराब चल रहा था। उप-कमान अधिकारी महोदय को 'चीता' हेलीकॉप्टर से ऊपर जाने की बात बनती नज़र नहीं आई थी। उन्होंने  मुझे बताया था कि अगली सुबह मुझे उनके साथ तेजपुर स्थित हवाई अड्डे पर चलना था और वहां हमें वायुसेना की मदद से ऊपर जाने का प्रयास करना था। उस समय वायु सेना के सामने उस सेक्टर में फंसे सैनिकों, खच्चरों इत्यादि को रसद पहुंचाने की चुनौती थी। डकोटा विमान और एम आई-26 जैसे विशालकाय हेलीकॉप्टर  खराब मौसम के बावजूद रसद पहुंचाने के काम में जुटे हुए थे। वायु सेना की ज़िम्मेदारी मात्र रसद पहुंचाने की थी। आदमियों को लाने और ले जाने की नहीं।  मुझे सलाह दी गयी कि मैं साथ ले जाने के लिए अपना ज़रूरी सामान छांट लूं और बाकी सामान से भरा बक्सा उसी जगह पर छोड़ दूँ। बक्से को बाद में असम के 'चंगसारी' स्थित यूनिट के बेस कैंप में पहुंचा दिया जाना था। 


मैंने अपनी गर्म फौजी बर्दियां, बूट-जुराबें, कंबल, दरी मच्छरदानी, दाड़ी बनाने का सामान, टूथपेस्ट, टूथब्रुश इत्यादि छांट लिए थे और शेष सामान से भरा बक्सा वहीं छोड़ दिया था।  सिविल कपडों को साथ ले जाने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि जहां मुझे जाना था वहां उन्हें पहनने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था। 


तेजपुर हवाई अड्डे पर पहुंच कर उप-कमान अधिकारी महोदय ने स्वयं थलसेना का हेलीकॉप्टर पायलट होने का लाभ उठाते हुए वायुसेना के एक एम आई-26 हेलीकॉप्टर के कमांडर से जान पहचान कर ली थी।  उनका काम बन गया था।   वह हेलीकॉप्टर में सवार हो कर अरुणाचल प्रदेश की ओर उड़ गए थर। कठिनाइयां कैसी भी हों प्रयास करने पर उनकी चाबी देर-सबेर मिल ही जाती है।  जाने से पहले उन्होंने मुझे बताया था कि मैं उस वायुसेना के अधिकारी के सम्पर्क में रहूँ उन्होंने मौका मिलते ही उसी दिन मुझे अरुणाचल प्रदेश में स्थित 'रूपा' नामक स्थान पर पहुंचा देना था। वहां से मुझे सीधे कोई भी गाड़ी लेकर 6-7 किलोमीटर दूर 'वीरपुर' जाना था। उन्होंने मुझे यह हिदायत भी दी थी कि मैं रूपा में उतरने के बाद किसी को अपना नाम न बताऊं। मुझे उनकी आखिरी हिदायत अटपटी सी लगी थी पर स्पष्टीकरण के लिए समय नहीं था। कानों को विशालकाय हेलीकॉप्टर के रोटर की आवाज़  के अतिरिक्त कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा था। 


मैं हवाई अड्डे के किनारे पर खड़ा उस हेलीकॉप्टर को आते-जाते देखता रहा था। दोपहर के बाद मैंने सोचा क्यों न हेलीकॉप्टर के कमांडर से बात की जाए कहीं वह मुझे ले जाने की बात भूल न गए हों। मेरे पूछने पर उन्होंने बताया था कि उन्हें याद था और वह दिन की आखिरी उड़ान जो 'रूपा' जाने वाली थी, उसमें मुझे भी ले जाने वाले थे। दरअसल वह हेलीकॉप्टर लगातार बारी-बारी अरुणाचल प्रदेश स्थित 'रूपा' और ‘दिरांग’ के लिए रसद के साथ उड़ानें भर रहा था। हेलीकाप्टर के इंतज़ार के दौरान मेरी मुलाकात अपनी यूनिट के एक और जवान से हो गई थी। वह भी अरुणाचल प्रदेश जाने की फिराक में था। मैंने उसे आश्वासन दिया कि मैं  हेलीकॉप्टर के कमांडर से बात करके उसको भी साथ ले जाने का प्रयास करूँगा। 


आखिर जाने की घड़ी आ गयी। मैंने बात करके उस जवान को भी साथ ले लिया। अंदर आकर देखा हेलीकॉप्टर में कैरोसिन, डीजल और पेट्रोल से भरे 200-200 लीटर के कई बैरल भरे पड़े थे जिनका वजन 12000 किलोग्राम था। उसमें हम दोनों का, व्यक्तिगत सामान सहित, 100 कि. ग्रा. प्रत्येक के हिसाब से, 200 कि. ग्रा. बजन और जोड़ दिया गया। इस तरह वह विशालकाय एम आई-26 उस सफर में 12200 किलोग्राम भार ले कर उड़ने को तैयार था। 


―भगत राम मंडोत्रा


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