3. एम.आई-26 हेलिकॉप्टर की सवारी
एम.आई-26 हेलिकॉप्टर की सवारी
हैलीकॉप्टर के अंदर लदे ईंधन के बैरल अच्छी तरह बंधे हुए थे। वहां बैठने के लिए कोई सीट नहीं थी। मैं और मेरा साथी सैनिक बैरलों के साथ खड़े हो गए थे। हमें बस और ट्रेन में खड़े हो कर सफर करने की आदत जो थी। इतने में ही एक-एक करके हैलीकॉप्टर के चालक दल के सदस्य ऊपर चढ़े थे और केबिन का दरवाज़ा खोल कर सभी अंदर चले गए थे। हम दोनों वहां के वहां ही खड़े रहे थे। थोड़ी देर बाद अंदर से केबिन का दरवाजा खुला था और हैलीकॉप्टर के कमांडर ने हमें अंदर आने का इशारा किया था। दरअसल वो हमारे अंदर आने का इंतज़ार कर रहे थे पर जब हम अपने आप अंदर न गए तो उन्हें हमें बुलाने आना पड़ा था।
अंदर जा कर हमने देखा था हैलीकॉप्टर का पायलट केबिन एक अच्छे ख़ासे कमरे जितना था और वातानुकूलित था। जुलाई महीने की तेजपुर (असम) की चिपचिपी गर्मी से राहत मिली थी। केबिन में वायु सेना के दो पायलट, एक नेविगेटर और एक फ्लाइट इंजीनियर अपने-अपने काम में मग्न थे। एमआई-26 को दुनिया का आज तक सबसे बड़ा हैलीकॉप्टर होने का गौरव प्राप्त है। हमारे देश ने भूतपूर्व सोवियत यूनियन से 1986-1989 के दौरान चार एमआई-26 हेलीकाप्टर खरीदे थे। 20,000 किलोग्राम सामान उठा ले जाने की क्षमता वाले ये हैलीकाप्टर संकट के समय देश के बहुत काम आते रहे थे। 1999 के कारगिल युद्ध में हमारे तोपखाने की बोफ़ोर तोपों ने बड़ी अहम भूमिका निभाई थी। उन तोपों को उठा कर हवाई मार्ग से आनन-फानन उस पर्वतीय युद्ध क्षेत्र में पहुंचाने वाले ये एमआई-26 हैलीकॉप्टर ही थे। उन चार हैलीकॉप्टरों में से एक 2010 में क्रैश हो गया था और बाकी के तीन अब उड़ान भरने के काबिल नहीं रहे हैं। वो ओवरहॉल के लिए रूस जाने की प्रतीक्षा में हैं। इनकी जगह भारतीय वायुसेना में अमरीका से 2019 में आए 15 चिनूक हैलीकॉप्टर शामिल हुए थे। 'चिनूक' एमआई-26 की तुलना में बड़ा फुर्तीला और कम खर्चीला है पर उसकी भार उठाने की क्षमता एमआई-26 से लगभग आधी है। 'चिनूक' एमआई-26 की तरह भारी तोपें, ट्रक, बुलडोज़र इत्यादि नहीं उठा सकता है।
एम आई- 26 हैलीकॉप्टर, जिसमें हम बैठे थे, अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ों की ओर मंथर गति से बढ़ता जा रहा था। ऊंचे-ऊंचे पर्वत शिखरों पर उड़ने की कल्पना से रोमांच की अनुभूति हो रही थी। हालांकि मुझे ऊंचाई से डर लगता है पर उस दिन पता नहीं कैसे मेरे मन को विश्वास हो गया था कि उस हैलीकॉप्टर में कोई खतरा नहीं था। ऊंचाई का डर मन की कमजोरी होता है पर मैं आज तक इस कमजोरी से छुटकारा नहीं पा सका। शीघ्र ही हमारा उड़न-खटोला असम के मैदानों को पार कर अरुणाचल प्रदेश के एक पहाड़ी नाले में प्रवेश कर गया था। दोनों और ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच में गहरी संकरी खाई में उड़न-खटोला घरघर्राता हुआ चट्टानों से बचता-बचाता हुआ मानो हवा में रेंगता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। मुझे पहली बार पता चला था कि सामान्यत: उड़न-खटोले पर्वत शिखरों पर जाने के बजाय नदी-नालों के सहारे अपनी मंज़िल की ओर बढ़ते हैं। आधे-पौने घंटे के बाद उड़न-खटोला ज़मीन पर उतरा। जी हां, वो मेरी मंज़िल ‘रूपा’ ही था।
नीचे उतरते ही मुझे ठंड का अहसास होने लगा था। मेरे साथी सैनिक को रूपा ही जाना था पर मुझे ‘वीरपुर’ जाने की हिदायत मिली थी। मैंने चारों ओर नज़र दौड़ा कर उस इलाके का जायजा लिया। रूपा टेंगा-चू नदी किनारे दो ऊंची-ऊंची तंग पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसाई गई एक छोटी सी सैनिक छावनी था। उसके सामने, नदी के उस पार, सिविलियन बस्ती दिख रही थी। बीच में नदी पर एक पुल था। तभी मेरी नज़र थोड़ी दूरी पर स्थित टेंगा-चु (नदी) के किनारे एक छोटे से धवल स्मारक पर पड़ी थी। ये 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद योद्धा ब्रिगेडियर होशियार सिंह की समाधि थी। उन्होंने चीनियों से लड़ते-लड़ते रूपा के आसपास अपने प्राणों की आहुति दी थी। मेरी आँखों में अपने राजकीय हाई स्कूल, सरी-मोलग की छटी कक्षा (1966) के कमरे की दीवार पर लगे 1962 के प्रमुख शहीदों के छाया चित्र तैर गये थे। उनमें ब्रिगेडियर होशियार सिंह का छाया चित्र भी था। उन छाया चित्रों पर लिखा था "वह मरे कि भारत जीये"। मैंने श्रद्धा से समाधि को विधिवत सेल्यूट किया था और वीरपुर जाने के लिए किसी सैनिक वाहन की तलाश में इधर उधर नज़रें दौड़ाने लगा था। उस समय उस क्षेत्र में प्राइवेट वाहन नज़र नहीं आते थे। तभी संयोगवश वहां इन्फेंट्री यूनिट की एक जीप आकर रुकी थी। मैंने जीप चालक से कहा था कि मुझे वीरपुर जाना था और मुझे पता नहीं कि वो किस तरफ पड़ता था ऊपर की ओर या नीचे की ओर। चालक के बताने पर कि वह नीचे की ओर स्थित टेंगा जा रहा था और वीरपुर रास्ते में पड़ता था, मैं जीप पर सवार हो गया था। रूपा में उस समय 5 पर्वतीय तोपखाना ब्रिगेड का मुख्यालय हुआ करता था और अग्रिम पंक्ति में तैनात मेरी यूनिट उसी के अधीन थी। मैंने अपने उप-कमान अधिकारी के निर्देशानुसार अपना नाम रूपा में किसी को नहीं बताया था।
जीप टेंगा चु के किनारे-किनारे सर्पाकार सड़क पर दौड़ती जा रही थी।
― भगत राम मंडोत्रा
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