4. कुछ है तो नहीं?



कुछ है तो नहीं?


वीरपुर पहुंच कर मैं अपनी यूनिट के जवानों से जा मिला था। वहां बैरक के एक कमरे में हमारे मात्र 3-4 सैनिक ही थे। उनमें से एक जवान मेरे लिए  चाय ले कर आ गया था। जुलाई महीने में भी सर्दी का अहसास हो रहा था। कहां वो असम की गर्मी और कहां अरुणाचल प्रदेश की ठंड।  थोड़ी ही देर में बहुत कुछ बदल गया था। खैर उस चाय का बहुत आनंद आया था। फ़ौजियों को एक दूसरे का मित्र बनने में  अधिक देर नहीं लगती। वे एकजुट, एक परिवार की तरह रहते हैं और उनमें एक दूसरे के सुख-दुःख में भागीदार होने की भावना दूसरों से कम नहीं बल्कि सवाई मिलती है।  मुझे इस बात का पहले से ही पता था कि मेरी नई यूनिट खालिस अहीर जाति की तोपखाना यूनिट थी।   मैं अहीरों के साथ पहले भी रह चुका था।  सन् 1976 में मिलिट्री बेसिक ट्रेनिंग पूरी होने के बाद मेरी पहली पोस्टिंग तोपखाने की एक मीडियम रेजिमेंट में हुई थी जिसकी पहली बैटरी अहीरों की, दूसरी बैटरी राजपूतों की और तीसरी बैटरी सिक्खों की थी।  सेना में अधिकतर अहीर हरियाणा और उत्तर प्रदेश से आते हैं।  ये मिलनसार, बहादुर और स्पष्टवादी होते हैं।  


हमारे देश में अंग्रेजों के शासन काल से सैनिक यूनिटों का गठन क्षेत्रीय, जातीय और धार्मिक आधार पर होता रहा है।  इसके पीछे कदाचित यूनिटों में गर्व व प्रतिस्पर्धा की भावना उत्पन्न करके उनसे बेहतर से बेहतर काम लेना रहा होगा।  स्वतंत्र भारत में इस नीति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पड़ गई थी जब जून सन् 1984 में ऑपेरशन 'ब्लू स्टार' के फलस्वरूप कुछ सिक्ख यूनिटों में धार्मिक भावनाओं को चोट लगने के कारण विद्रोह फूट पड़ा था।  जिस तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय से मैं स्थानांतरित हो कर आ रहा था उस समय उसके अधीन तोपखाने की एक सिक्ख फील्ड रेजिमेंट के लगभग 30 जवानों ने विद्रोह करके दो सैनिक गाड़ियों में छोटे हथियारों और एम्युनिशन के साथ अमृतसर की तरफ कूच कर दिया था।  उस क्षेत्र की पुलिस की मुस्तैदी के कारण उनको रास्ते में ही रोक लिया गया था। पुलिस मुठभेड़ में एक विद्रोही सैनिक हवलदार की मृत्यु हो गई थी।  लगभग 28 भगौड़े सैनिकों को 'जनरल कोर्ट मार्शल' का सामना करना पड़ा था।  सभी को दोषी पाए जाने पर  सेना से बर्खास्तगी और 8 वर्ष से लेकर 14 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। उस समय मैं उस ब्रिगेड मुख्यालय की 'ए क्यू' शाखा में वरिष्ठ था।  उस ब्रिगेड मुख्यालय के साथ सेवाकाल के दौरान इस मामले के सम्बंध में पत्राचार मेरा मुख्य कार्य रहा था।  मेरे स्थानांतरण का समय आते-आते अर्थात् सन् 1989 उत्तरार्ध तक  8 वर्ष का कारावास पाने वालों की कारावास अवधि लगभग समाप्त हो गई थी और शेष की कारावास अवधि मात्र 2 से 6 वर्ष की रह गई थी।  सजायाफ्ता सैनिकों के प्रति सेना व सरकार ने नर्म रुख अपनाया था।  जब भी वो सैनिक सेना मुख्यालय में याचिका दायर करते थे उनकी दो वर्ष तक की सजा माफ हो जाती थी पर उन्हें सेना में बहाल नहीं किया गया था।  इसके उपरांत अंदर ही अंदर सैनिक यूनिटों को विभिन्न जाति, धर्म और क्षेत्रों की यूनिटों में बदलने की प्रक्रिया धीरे-धीरे आरंभ हो गई थी। 


वीरपुर में प्रारंभिक परिचय के बाद साथी जवानों ने मुझे बताया था कि उप-कमान अधिकारी महोदय रूपा में ठहरे थे और उनका आदेश था कि मेरा वहां पहुँचना गुप्त रखा जाए।  ऐसा क्यों हो रहा था, मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। थोड़ी देर बाद फ़ौजी टेलीफ़ोन की घंटी बजी थु। उप-कमान अधिकारी महोदय मुझ से बात करना चाह रहे थे। उन्होंने मुझे बताया था कि हमें उस जगह से दो दिन बाद तवांग के लिये सड़क मार्ग से चलना था।  टेंगा में यूनिट की एक वन-टन गाड़ी थी उसने आकर मुझे  लेना था और उप कमान अधिकारी ने रूपा से अपनी जोंगा में चलना था। दोनों गाड़ियों का मिलाप रूपा और वीरपुर के बीच पड़ने वाले एक पुल पर होना था जहां से बोमड़ीला की ओर सड़क मार्ग जाता था। मुझे फिर हिदायत दी गयी थी कि मेरे वहां पहुंचने का किसी को पता न चले। इससे पहले कि मैं कुछ पूछता फोन कट चुका था। 


अगले दिन मुझे वहां एक दूसरी तोपखाना फील्ड रेजिमेंट के सैनिक मिले जो मुझे पहचानते थे। दरअसल अरुणाचल प्रदेश आने से पहले उनकी यूनिट राजस्थान में उसी ब्रिगेड के अधीन थी जिसके मुख्यालय में साढ़े चार वर्ष सेवा करने के उपरांत मैं अरुणाचल प्रदेश में पोस्टिंग पर आ रहा था। उनके कमांडिंग अफसर एक मराठा कर्नल थे।  बहुत खुश मिज़ाज स्वभाव के कर्नल थे वो। जब भी वह ब्रिगेड मुख्यालय में आते सबसे पहले मुझ से आकर मिलते और पूछते थे 'कुछ है तो नहीं?'  दरअसल मैं ब्रिगेड मुख्यालय की जिस शाखा में था उसके कार्यक्षेत्र में 'अनुशासन'  का विषय भी आता था। ब्रिगेड कमांडर महोदय जब भी यूनिट कमांडरों को सीलबन्द लिफाफों में सलाह अथवा चेतावनी देते थे तो वो लिफाफे मेरे हाथों से होकर ही जाते थे।  उन कर्नल महोदय द्वारा मुझ से उपरोक्त प्रश्न पूछने की एक बजह वो लिफाफे थे और दूसरा बजह थी उनकी यूनिट को मेरी शाखा के कार्यालय से भेजे गए 'स्मरण पत्रों' (रिमाइंडर्स) की जानकारी लेना। तत्कालीन ब्रिगेड  कमांडर महोदय का स्मरण पत्रों के प्रति रुख कड़ा था। 


उन लिफाफों का जिक्र आया तो उनसे सम्बंधित एक और घटना याद आ गई।  नवंबर 1986 से मार्च 1987 तक भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने पश्चिमी सीमा पर एक अभूतपूर्व  युद्धाभ्यास किया था। यह युद्धाभ्यास द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सेनाओं का सबसे बड़ा जमाबड़ा था।   हर युद्धाभ्यास को एक  नाम दिया जाता है। उस युद्धाभ्यास का नाम था 'एक्सरसाइज ब्रास्टैक्स IV'।  मोटे तौर पर उस युद्धाभ्यास के द्वारा तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर भारतीय सेना के तीव्र संचालन, रसद पूर्ति एवं मोबाइल हथियारों को आजमाना चाहते थे। इस के लिए लगभग आधी भारतीय सेना थार के मरुस्थल में पाकिस्तानी सीमा के समीप तैनात कर दी गई थी।  पाकिस्तान  उसे अपने लिए खतरा समझ कर अपनी सेनाओं के एक बड़े भाग को सीमा पर ले आया था। दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति बन गई थी।  भारतीय सेना ने 'एक्सरसाइज ब्रास्टैक्स IV' स्थगित करके 'ऑपरेशन ट्राइडेंट' का उद्घोष कर दिया था। 


जिस तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय के साथ मैं था उसकी यूनिटों ने भी युद्ध होने की स्थिति में अपने जिम्मेदारी के इलाकों की ओर संध्या के समय कूच कर दिया था। जब भी कोई यूनिट अपनी जगह बदलती है उसे अपनी 'निर्गमन सूचना', 'आगमन सूचना' और 'स्थिति सूचना' अपने से ऊपर वाले मुख्यालय को देनी पड़ती है।  हमारे ब्रिगेड की दो रेजिमेंटों ने, जिनमें एक 'फील्ड रेजिमेंट' थी और एक 'लाइट रेजिमेंट', देर रात अपनी जगह पर पहुंच कर अपनी सूचना सेना के टेलीफोन नेटवर्क के माध्यम से प्रेषित कर दी थी।  उसका हमारे ब्रिगेड कमांडर महोदय ने गंभीर रूप से संज्ञान लिया था।  उन्होंने दोनों यूनिटों के कमांडिंग अफसरों को फोन पर डांट लगाई थी और उन्हें तुरंत अपनी लोकेशन बदल कर नई लोकेशन रिपोर्ट  के साथ व्यक्तिगत रूप से ब्रिगेड मुख्यालय में हाजिर होने के आदेश दिए थे। जब ब्रिगेड कमांडर साहब रात को यूनिट कमांडिग अफसरों को डांट रहे थे तब मैं नजदीक ही अपने तंबू में लेटा उनकी आवाज को स्पष्ट सुन पा रहा था।  पिछले डेढ़ साल में मैंने ब्रिगेड कमांडर साहब  को कभी भी क्रोधित होते हुए न देखा था न सुना था। वह शांत प्रकृति के एक कुशल कमांडर थे। दरअसल उस समय तक सेना का टेलीफोन नेटवर्क किसी भी महत्वपूर्ण सामरिक सूचना भेजने के लिए सुरक्षित नहीं होता था। कई किलोमीटर तक जमीन पर बिछाई गई असुरक्षित टेलीफोन तारों को टेप करके शत्रु पक्ष महत्वपूर्ण संदेशों को सुन सकता था।  अगर शत्रु को हमारी उन दो यूनिटों की सटीक लोकेशन का पता चल जाता तो युद्ध होने की स्थिति में हमारा बहुत नुकसान हो सकता था।


―भगत राम मंडोत्रा





      

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