5. जहां भी रहो, खुश रहो


जहां भी रहो, खुश रहो


रात के लगभग डेढ़ बज रहे थे।  मैंने अपने तंबू के बाहर कुछ आहट सुनी।  बाहर आकर मैंने चांदनी में देखा 'फील्ड रेजिमेंट' के कमांडिग अफसर वह मराठा कर्नल मुझे ही ढूंढ रहे थे। उनके पीछे 'लाइट रेजिमेंट' के सीओ भी थे।  मैंने तुरंत सावधान हो कर उन्हें सेल्यूट किया था।  उन्होंने सेल्यूट के जवाब के साथ  मुझ से पूछा था, 'भगत, कुछ है तो नहीं?' 'नहीं सर, मेरे पास कुछ नहीं है।  हो सकता है कमांडर साहब के पी ए साहब के पास कुछ हो' मैंने जवाब दिया था। उस समय ब्रिगेड कमांडर साहब के पीए आर्मी सप्लाई कोर के सूबेदार मेजर साहब थे। 'वो कहां मिलेंगे?' उनके पूछने पर मैं उन्हें उस चांदनी रात में ब्रिगेड कमांडर के कारवां तक ले गया जहां कारवां के बगल में ही उनके पीए का शेल्टर था।  उन्होंने अपनी-अपनी लोकेशन रिपोर्ट ब्रिगेड हैडक्वाटर के 'फायर डायरेक्शन सेन्टर' में पहले ही जमा कर दीं थी।


दोनों देशों की सेनाओं के बीच तनाव चर्म पर था तभी पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक को जयपुर में भारत और पाकिस्तान की क्रिकेट टीमों के बीच होने वाले मैच को देखने के लिए बुलावा भेजा गया।  पाकिस्तानी राष्ट्रपति जयपुर आये और कुछ समझौते हुए। दोनों देशों की सेनाएं पीछे हटीं। हमारी सेना फिर से 'एक्सरसाइज ब्रास्टैक्स IV' में जुट गई। उस युद्धाभ्यास में शामिल सेना को दो भागों में बांट दिया गया था। एक भाग का नाम 'ब्लू लैंड फोर्सेज' और दूसरे भाग का नाम 'रेड लैंड फोर्सेज' रखा गया था। हमारा ब्रिगेड मुख्यालय 'ब्लू लैंड फोर्सेज' में शामिल था। ये सेनायें एक दूसरे पर आक्रमण और प्रतिआक्रमण कर रहीं थीं। कौन जीत रहा था और किसकी हार हो रही थी इसका निर्णय करने के लिए अंपायरों की टीमें नियुक्त की गईं थीं।


एक दिन दोपहर को मुझे 'ब्रिगेड मेजर' का एक संदेश मिला। उस संदेश में आदेश था कि मैं अपने ट्रक 3 टन शक्तिमान, जिसमें ऑफिस लदा था, को खाली करके उनके पास भेज दूं।  मुझे यह संदेश कुछ अटपटा सा लगा। मैं ब्रिगेड मेजर साहब के पास गया तो देखा ब्रिगेड का 'फायर डायरेक्शन सेंटर' समेटा जा रहा था।  मेरे पूछने पर ब्रिगेड मेजर ने बताया  था कि हमारी पोजीशन पर रेड लैंड फोर्सेज किसी भी समय आक्रमण कर सकती थीं इस लिए ब्रिगेड मुख्यालय वैकल्पिक पोजीशन पर जा रहा था। क्योंकि गाड़ियों की कमी थी इस लिए हमारी गाड़ी वापस लेने की जरूरत पड़ गई थी।  मैंने जब उनसे पूछा कि मेरा और मेरे तीन साथियों का क्या होगा तो उन्होंने बताया कि हम लोग रात को उसी जगह पर रहें, पर सावधान रहें क्योंकि हमें 'रेड लैंड फोर्सेज' द्वारा जंगी कैदी बनाया जा सकता था।  मैं चुपचाप लौट आया।  गाड़ी को खाली करके भेज दिया।  इतने में शाम ढल गई। अंधेरा हो गया।  हमें ये भी पता नहीं था कि हमारी तरह और किस किस को उस जगह पर छोड़ दिया गया था।  मैंने अपने साथियों को स्थिति से अवगत कराया और रात को चौकन्ना रहने की हिदायत दी।


मध्य रात्रि को मेरी नींद बाहर कोलाहल सुन कर अचानक खुल गई।  मैंने सोचा 'रेड लैंड फोर्सेज' का हमला हो गया। मैंने अपने साथियों को झकझोर कर नींद से जगाया।  हम टेंट से बाहर आकर वस्तुस्थिति का जायजा लेने लगे।  शोर  हमसे तकरीबन 100-150 गज दूर स्थित एक ऊंचे रेत के टीले से आ रहा था। वहां पर संचार व्यवस्था के लिए ब्रिगेड सिगनल कंपनी की एक छोटी सी टुकड़ी तैनात थी।  उन्होंने वहां ऊंचा सा एंटीना लगा रखा था।  दो तीन आदमियों की अस्पष्ट आवाजें सुनाई दे रहीं थी। समझ नहीं आ रहा था वे 'बचाओ.. बचाओ' चिल्ला रहे थे या 'बचो..बचो'।  तभी ब्रिगेड मुख्यालय कैम्प का एक जवान दौड़ता हुआ आया और मुझ से कहने लगा, 'सर, सूबेदार मेजर साहब ने आपके लिए मैसेज भेजा है कि जितना जल्दी हो सके आप एक लालटेन जला कर उसे लम्बे डंडे से बांध कर हिलाना शुरू कर दें।'  मैंने तुरंत आदेश का पालन किया।  लालटेन निकाली और उसे जला कर टेंट के फालतू पड़े डंडे के साथ बांध कर अपने एक साथी को हिलाने के लिए दे दिया।  दरअसल हुआ ये था कि उस रात को हमारी 'ब्लू लैंड फोर्सेज' की एक टैंक रेजिमेंट के टैंक, विरोधी सेनाओं का दवाव न झेल पाने के कारण, पीछे हट रहे थे।  अपने टैंकों का रात को जब संचलन होता है तो सबसे आगे टोही टैंक चलता है और उसके पीछे-पीछे दूसरे टैंक उसके द्वारा चिन्हित मार्ग पर चलते हैं। थोड़ा सा भी इधर-उधर नहीं।   टैंको के मार्ग में जो भी आता है, कुचला जाता है।  अगर हम टोही टैंक को रोशनी दिखाते हैं तो वो समझ जाता है कि यहां सैनिक हैं और अपना मार्ग बदल लेता है।  उस रात को सूबेदार मेजर साहब की सलाह पर हमने रोशनी दिखाई और हम टैंकों द्वारा कुचले जाने से वाल-वाल बच गए।  उस युद्धाभ्यास में अपने ही टैंकों द्वारा कुछ सैनिकों के कुचले जाने की एक बारदात पहले हो चुकी थी।  



मार्च 1987 को ये युद्धाभ्यास समाप्त होने पर हम वापस अपनी-अपनी जगह पर आ गए थे।



सितम्बर 1988 के एक दिन जब उन कर्नल साहब का ब्रिगेड मुख्यालय में आना हुआ तो बड़े गंभीर हो कर मुझ से कहने लगे "देख भगत! तुम्हारी इस ब्रिगेड में टेन्युर पूरी हो चुकी है। तुम्हें किसी न किसी यूनिट में जाना ही पड़ेगा। मेरी यूनिट नेफा (अरुणाचल प्रदेश का पुराना नाम) जा रही है। मैं तुम्हें अपनी यूनिट में लेना चाहता हूँ। अगर तुम राजी हो तो मैं तुम्हारी पोस्टिंग अपनी यूनिट में करवाने की कार्रवाई शुरू करूँ।"  मैंने उन्हें विनम्रता से जवाब दिया था, "सर, आपकी यूनिट में काम करना मेरा सौभाग्य होता पर मैं अपने बेटे की सेंट्रल स्कूल में एडमिशन दिलाने के बाद ही इस जगह से जाना चाहता हूँ। आपकी यूनिट अभी जाने वाली है और बेटे की एडमिशन के लिए 6 महीने बाकी हैं। अभी इधर से जाना मेरे हित में नहीं है। मुझे माफ कर दीजिएगा"। फिर कर्नल अपने चिर-परिचित लहज़े में हंसते हुए बोले थे, "देख यार, तेरी छाती पर सिर्फ एक मैडल का रिब्बन है। मेरे साथ चलता तो दो मैडल और मिल जाते, एक हाई अल्टीटीयूड मैडल दूसरा सैन्य सेवा (नेफा) मैडल। चलो कोई बात नहीं जहां भी रहो, खुश रहो"।


- भगत राम मंडोत्रा


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