6. बरसात की वो रात

 


बरसात की वो रात


उस समय मेरे दो बच्चों में बड़ी बेटी (जो इस समय लड़ाकू सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल है) केंद्रीय विद्यालय में दूसरी कक्षा में पढ़ती थी और छोटा बेटा (जो इस समय बायोटेक्नोलॉजी में पीएचडी करके पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में सेवारत है) आर्मी स्कूल में यूकेजी में था। मैंने बेटे को केंद्रीय विद्यालय की पहली कक्षा में प्रवेश दिलाने के बाद ही उस जगह से जाने की सोच रखी थी। उन दिनों बच्चों को सेंट्रल स्कूलों में प्रवेश दिलाना एक कठिन कार्य होता था। प्रवेश मिल तो जाता था पर काफी दौड़-धूप करनी पड़ती थी।  मेरे बच्चों की शिक्षा अलवर, हमीरपुर, इलाहाबाद, भोपाल और देवलाली स्थित केन्द्रीय विद्यालयों में हुई थी।


मराठा कर्नल साहब से हुए उपरोक्त वार्तालाप के दो महीने के अंदर ही मेरे स्थानांतरण के आदेश आ गए थे। संयोगवश मुझे उसी सेक्टर में एक तोपखाना युनिट में जाना था जिस सेक्टर में उन मराठा कर्नल की युनिट गई थी। मैं वहां गया था पर अपने बच्चों और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियां  निभाने के बाद। मुझे जनवरी 1989 में इस नई युनिट में पहुंचना था पर बच्चों का स्कूल में दाख़िला मार्च-अप्रैल में होना था। मेरा सौभाग्य था कि ब्रिगेड मुख्यालय के उच्चाधिकारी मुझे जल्दी नहीं भेजना चाहते थे। नई युनिट और नए ब्रिगेड मुख्यालय ने मेरे स्थानांतरण के क्रियान्वयन के लिए दवाब बढ़ाया था और मामला दिल्ली स्थित सेना मुख्यालय के तोपखाना निदेशालय तक पहुंच गया था। यह देख कर मैंने अप्रैल में नई युनिट से वार्षिक अवकाश के साथ स्थानांतरित होने की प्रार्थना की थी जो उन्होंने स्वीकार कर ली थी। अब मुझे पुरानी जगह से मुक्त होने के उपरांत दो महीने की छूटी काट कर नई जगह को जाना था। पहले मैंने अपने बेटे को पुरानी जगह के केंद्रीय विद्यालय में प्रवेश दिलाया था और फिर दोनों बच्चों का हमीरपुर केंद्रीय विद्यालय के लिए ट्रांसफर सर्टिफिकेट लिया था। छूटी के दौरान हमीरपुर में पत्नी सहित बच्चों के ठहरने का प्रबंध करने के बाद ही मैं नई युनिट में शामिल होने के लिए चला था।  


मैंने बड़ी उत्सुकता के साथ उन मराठा कर्नल की युनिट के जवानों से पूछा था, 'आपके सीओ साहब कहां हैं मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।' सभी जवान एकाएक चुप होकर मेरे ओर देखने लगे थे जैसे कि मैंने कोई गलत बात पूछ ली हो। उनका ये व्यवहार देख कर मुझे कुछ हैरानी हुई थी तभी एक जवान ने बड़ी गंभीरता से उत्तर दिया था, "अब सीओ साहब से आप कभी नहीं मिल सकते वो चार महीने पहले स्वर्ग सिधार  गए हैं"। उत्तर सुन कर मैं सन्न रह गया था। "क्या हुआ था?" मैंने लगभग चीखते हुए पूछा था। "सर, कर्नल साहब छुट्टी पर घर जा रहे थे। टेंगा से भालुकपोंग के रास्ते के बीच उनकी जीप गहरी खाई में गिर गयी थी। जीप में उनको मिला कर तीन आदमी सवार थे। कोई भी नहीं बचा था।" मेरी आखों के सामने सैनिक वर्दी में सजे कर्नल साहब का हंसमुख चेहरा तैरने लगा था।


उस समय तक अरुणाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय क्षेत्र में सड़कों  की हालत अच्छी नहीं थी। तब तक वहां खराब सड़कों के कारण सड़क दुर्घटनाओं में सैकड़ों जवानों की अनमोल जानें जा चुकीं थीं।  इसका मुख्य कारण सम्भवतः हमारी सरकारों का डर था कि कहीं 1962 की तरह हमारी बनाई गई सड़कों का प्रयोग चीनी सेना न कर ले। 1962 में चीनी सेना ने बड़ी चतुराई के साथ हमारे क्षेत्र की पगडंडियों और सड़कों का प्रयोग हमारी सेना को  घेरने के लिए किया था।


उन जवानों ने मुझे बताया गया कि जहां से कर्नल साहब की जीप नीचे गिरी थी उस जगह को अब "कर्नल मोड़" के नाम से जाना जाता है और वहीं पर उनकी समाधी भी है। इस बार वो जगह मैंने हैलीकॉप्टर पर सवार हो कर पार कर ली थी। सोचा जब मौका मिलेगा 'कर्नल मोड़' पर कर्नल साहब को सेल्यूट ज़रूर करूंगा।


वीरपुर पहुंचते ही मुझे स्लीपिंग वैग मिल गया था। जुलाई महीने में भी वहां अच्छी ख़ासी ठंड थी। बरसात जोरों पर थी। हमारा झोंपड़ा वीरपुर के उत्तरी छोर पर टेंगा चू (नदी) के किनारे स्थित था। टेंगाचू  की धारा उफान पर थी। दोनों तरफ विशाल पर्वत और बीच में संकरी खाई में उछालें मारती टेंगाचू।  उसके किनारे कुछ ही गज की दुरी पर हम। दिन में आकाश का मात्र छोटा सा टुकड़ा दिखाई देता था। ऐसा लग रहा था कि मैं गहरे खाली कुएं में आ फंसा। घुटन सी हो रही थी। खुले आकाश का नज़ारा लेने को दिल तरसता था। गिला-शिकवा किससे करता? मैंने सैनिक वर्दी स्वेच्छा से धारण जो की थी। रात को बादलों की गर्जन, सनसनाती हवाएँ, कुलांचें मारती नदी का शोर और घुप अंधेरे में चमकती बिजली वातावरण को डरावना और भूतिया बनाते थे। उस समय उस इलाके में बिजली की सुविधा नहीं थी। 


जब में सैनिक वर्दी में होता था, मुझे किसी भी चीज से ड़र नहीं लगता था। जैसे कपड़े की वर्दी न हो कर कोई अभेद्य कवच पहन रखा हो। अग्रिम क्षेत्रों में सैनिक हमेशा सैनिक वेश-भूषा में ही रहते हैं। सिविल कपड़े पहनने की बारी तो छूटी जाते समय रेलवे स्टेशन पर  ही आती है। फौजी बेल्ट पहन कर कुछ अलग सी अनुभूति होती है। सैनिक बर्दी में टोपी की गरिमा और महत्व कुछ अलग ही होता है। टोपी पर युनिट अथवा रेजीमेंट बिशेष का निशान (बैज) लगा होता है और उस पर संबंधित आदर्श वाक्य खुदा होता है। जैसे कि तोपखाना रेजिमेंट का आदर्श वाक्य है “सर्वत्र इज्जत-ओ-इकबाल”। सेना में बिना टोपी के कभी सेल्यूट नहीं किया जाता है।  बिना टोपी का सेल्यूट केवल फिल्मों में हीरो ही करते हैं।


एक रात कुछ अजीब सी आवाजें सुन कर मैं नींद से जग कर उठ बैठा था। माचिस की तीली जला कर देखा रात के सवा बारह बज रहे थे। बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। रह-रह कर चमकती आकाशीय बिजली की रोशनी में मैंने देखा हमारे झोंपड़े से कुछ ही गज की दूरी पर हमारी ओर के ऊँचे पर्वत  शिखर से विशालकाय चट्टानें तेजी से नीचे लुढ़कती हुई आ रही थीं। मलबे के पत्थर जब आपस में टकराते तो आग की चिंगारियां निकलती नज़र आ रही थीं। नदी किनारे स्थित सड़क पर मलबे का ढेर चमकती बिजली के झपाके में साफ दिखाई दे जाता था। बड़ी-बड़ी चट्टानें गिर कर नदी के वहाब में रुकावट डाल रहीं थीं। अगर नदी का प्रवाह पूरी तरह रुक जाता तो बांध बन जाना था और उसके टूटने पर प्रलय हो जानी थी। हम में से कोई भी नहीं बच पाता। गिरती चट्टानें हमारी ओर भी आ सकती थीं। मैंने दूसरे साथियों को भी झिंझोड़़ कर जगा दिया था। कभी भी कुछ भी हो सकता था। सभी सहमे हुए बैठे थे। कोई किसी से कुछ भी नहीं बोल रहा था। बरसात की वो रात कई जिंदगियों पर भारी पड सकती थी। उस रात वहां मौजूद सभी ने अपने-अपने आराध्य को याद तो ज़रुर किया होगा। मैंने तो किया था। काफी देर चुपचाप बैठे रहने के बाद पता ही नहीं चला हम कब लेट गए और गहरी नींद में समा गए।


जब हम सुवह उठे तो  काफी उजाला हो गया था।  हमने देखा हम से कुछ गज की दूरी पर सड़क का एक लंबा हिस्सा मलबे के एक विशाल ढेर तले दब गया था। ऊपर की और जाने का मार्ग भारी मशीनों की सहायता से दोपहर के बाद ही खुल पाया था।


वो दिन भी बीत गया। अगली सुबह आई। उस दिन हमने तवांग की ओर कूच करना था। नदी के दोनों ओर खड़े ऊँचे पर्वत शिखरों पर सूर्य ने धूप की उजली चादर ओढ़ा दी थी। खुश-नुमा माहौल था। मैं अपना सामान समेट कर आगे के सफर की परिकल्पना में खोया था। तभी नीचे की ओर स्थित टेंगा से एक वन-टन गाड़ी आई थी और मैं उस पर सवार हो कर उस पुल की तरफ चल पड़ा था जहां उप-कमान अधिकारी की जोंगा से मिलाप होना था।


―भगत राम मंडोत्रा


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