7. हाँ यादव, मैं बिल्कुल ठीक हूँ


          हाँ यादव, मैं बिल्कुल ठीक हूँ

ट्रक वन टन 4×4 निसान गड्डिया जो नायक याद राम यादव चला दे थे।  मैं तिन्हां बक्खें बैठेया था।असां दूंही दी सरासर बाक्मी गड्डिया दिया सीटा पर बैठेयां-बैठेयां ही होई थी।  नायक (ड्राइवर मैकेनिकल ट्रांसपोर्ट डी.एम.टीयाद राम यादव मद्धरे कद दे गोरे-चिट्टे तेजतर्रार जुआन थे। गड्डिया दे पिछले पासें भी इक जुआन बैठेया था। तिसदा ट्रेड टेलर (दर्जीथा।

फ़ौज च भर्ती होणे वाळे हर शख्स जोचाहे सैह् कुसी भी ट्रेड दा होएडरैवर होएक्लर्क होए या फिरी कुक होएबेसिक मिलिट्री सखळाई दे दौरानछोटे हथियार चलाणा सखाए जांदे हन।  रैफळकार्बाइन मशीनलाइट मशीन गन कनै ग्रेनेड छोटे हथियारां च गिणे जांदे हन।  इसते इलावा सारेयां जो हथियारे कन्नै कनै हथियारे बगैर ड्रिलफील्ड क्राफ्ट (रणभूमि चतराई), जिस्म दी सखलाई बगैरा ते गुजरना पोंदा है। एह् मुढ़ली सखलाई तकरीबन पंज महीनेंयां दी होंदी है। इसा सखलाईया जो पास करने दे परंत अपणे-अपणे ट्रेड दी एडवांस सखलाई दित्ती जांदी है जिसा दी मियाद ट्रेड दे साह्बे नै लग-लग होंदी है।  वर्दी पहनणे वाला हर फौजीचाहे कुसी भी ट्रेडे दा होएइक लड़ाकू फौजी होंदा है।  हर फ़ौजिये दा अपणा इक हथियार होंदा है जेह्ड़ा फहाजता कन्नै यूनिट दे कोत च रक्खेया रैंह्दा है कनै ज़रूरत पोणे पर दित्तेया जांदा है। हर फ़ौजी अपणे हथियारे दिया साफ-सफाइया तांईं जवाबदेह होंदा है। हर फैरिंग भ्यासे दे पैह्लें कनै बाद च इलेक्ट्रिकल मेकैनिकल इंजीनियरज (.एम.कोर दे आरमौररां ते हथियारां दी जांच-परख करुआणा लाजमी होंदी है। तिसते इलावा हर साल इक बरी हथियारां समेत गड्डियांतोपांरेडियो सेटां कनै होर मशीनां दी बरीकिया कनै जांच होंदी है जिस तांईं जुआनां जो कड़ी मेहणत करनी पोंदी है।

थोड़ी कि देरा परंत गड्डी तिसा ठाहरी जाई पूज्जी जित्थू रेजिमेंट दे उपकमाण अफसर होरां दिया गड्डिया कन्नै असां दिया गड्डिया दा मलाप होणा था।ट्रक वन टन 4×4 निसान फौजा दी इक ताकतवर कनै भरोसेमंद मंझोली छोटी गड्डी होंदी थी।  राजस्थान दे रेतीले टिल्ले होंण जां फिरी बर्फीले पहाड़ां दियां सड़कांतिसा गड्डिया सोगी सानिया कन्नै सट्टोसट्टियें गाहे जाई सकदे थे पर तिसा गड्डिया च पट्रोले दी खपत जादा थी। इक लीटर पेट्रोले कन्नै सैह् मातर दो-तिन्न किलोमीटर ही चली पांदी थी। तांहीं तां अज्ज सैह् गुजरे जमाने दी चीज बणी गइयो। डरैवरें गड्डी सड़का दे कनारें खड़ेरी दित्ती थी। असां थल्लें उतरी करी उपकमान अफसर होरां जो निहागणा लगे थे।

इक छैळ नजारा असां दे साह्मणे था।  असां दे हेठलें पासें कळ-कळ बगदिया टेंगा चू नदिया दे परले पासे दे पहाड़े गास भ्यागा दिया धुप्पा दा नजारा बड़ा लुभावणा था।  थोड़िया कि देरा परंत रूपा दे पासे ते इक जोंगा सरपे सांहीं सुझदिया सड़का पर उपरा पासें असां व्ह्ली ओंदी दुसह्णा लगी पई थी। कुसी जमाने च भारत दिया फौज़ा दा 'वार हॉर्सकहाणे वाळी जोंगा च भी निसान दा सैही इंजन लगेया होंदा था जेह्ड़ा ट्रक वन टन गड्डिया च होंदा था। सैह् गड्डी ट्रक वन टन दे मुकाबले च इक निक्की गड्डी थी। जाहिर है कि सैह् गड्डी भी इक ताकतवर गड्डी होंदी थी पर इक लीटर पेट्रोले च सिरफ़ चार-पंज किलोमीटर ही चलदी थी। हुण एह् गड्डी भी तिहास बणी गइयो। किछ ही पलां च सैह् जोंगा आई करी असां दिया गड्डिया गांह् खड़ोई गई थी। लेफ्टिनेंट कर्नल साहब होरां गड्डिया ते उतरी करी असां दे सलूटे दा जवाब देणे ते परंत असां दा हाल-चाल पुच्छणा लगी पै थे।

गल्ल-बात करने दे टैमे मैं अपणे उपकमाण अफसर होरां ते पुच्छेया था कि मिंजो तित्थू अपणा नां गुप्त रखणे दी हिदायत देणे  दे पिच्छें क्या बजह थी।तिन्हां  दस्सेया था कि रूपा बिच पहाड़ी तोपखाना ब्रिगेड दे हैडकुआटरे च कम्म करने तांईं म्हारिया युनिटा ते मेरे ट्रेड दा इक हवलदार टेम्पररी डियूटी पर ओणा था।  यूनिटें ब्रिगेड हैडकुआटर जो वायदा दित्तेया था कि जाह्लू हवलदार भगत राम आई जांह्गा तां तिसजो तिन्हां व्ह्ली भेजी दिंह्गे। इंञा यूनिटें इक तीरे कन्नै दो नसाणे लगाह्यो थे — इक तां ब्रिगेड़ हैडकुआटरे जो अपणा जुआन तौळा भेजणे दिया गल्ला जो टाळणा कनै दूजा मेरे ओणे च होआ दी देरिया जो दूर करने तांईं ब्रिगेड हैडकुआटरे दा दखल हासल करना था। हुण हलात बदळी गैह्यो थे। मिसामारी बिच तिन्हां कन्नै मेरिया पैह्लिया मुलाकाता दा जिकर तिन्हां कमान अफसर होरां कन्नै कित्तेया था। मेरे इक छोटे जेहे कम्मे दा असर एह् होया था कि यूनिट मिंजो हुण हर कीमता पर अप्पु सोगी रखणा चांहदी थी। मेरे ओणे च देरी होणे दी बजह ते मती सारी खतो-किताबत होई थी कनै रूपा बिच तिस पहाड़ी तोपखाना ब्रिगेड हैडकुआटरे च कम्म करने वाले मते सारे लोकां जो  मेरे नां  दी जाणकारी थी।  इस तांईं मेरे तित्थू पोंह्चणे जो छपाया जाह्दा था। जेकर ब्रिगेड हैडकुआटर च कुसी जो मेरे ओणे दी भणक लगी जांदी तां मिंजो तिन्हां तित्थू ही रोकी लैणा था। इक युनिट तांईं अपणे ब्रिगेड हैडकुआटर दे हुक्मा पर अमल करना ज़रूरी होंदा है।

दोह्यो गड्डियां हौळें-हौळें बोमडिला दी टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाइया जो चढ़ाह् दियां थियां।  पहाड़ी सड़क संगड़ी थी। थोड़ी की दूर चलणे परंत सड़का दे दूंहीं पासें पत्थरां दियां पट्टियां दा इक सिलसिला शुरू होई गिया जिन्हां च 1962 च चीन कन्नै होइया लड़ाइया च बोमडिला दियां ढलानां च शहीद होए असां देयां फौजियां दे नाँ खुदेह्यो थे। कुत्थी-कुत्थी सड़क हादसेयां दे सिकार बणेयो जुआनां दियां यादगारां भी थियां।  सन् 1962 दे भारत-चीन जुद्ध दे महाजोद्धा ब्रिगेडियर होशियार सिंह दे ब्रिगेड जो खीरी वनासकारी चोट इस बोमडिला च ही लग्गी थी। सहीदां दियां समाधियां ते होई नै गुज़रदे वक़्त मिंजो किछ होर देया बझोआ दा था। मैं हर इक समाधिया जो सलूट करदा जाह्दा था। तिन्हां सहीदां दे बारे च सोची करी मेरे मनें च भांत-भांत दे ख्याल ओआ दे थे।  मेरे दिल-दमाक कनै हाखीं साह्मणे तिन्हां जगहां च 1962 दे जुद्ध दे सीन ओआ दे थे। जिस्म च रोंगटे खड़ोआ दे थे कनै झुरमुरी बझोआ दी थी।  मैंतिस वक़्त दे खतरनाक हलातां च देस तांईं अपनी जान देणे वाळेयां दियां यादां चगुमसुम होई गिया था।  ताह्लू चाणचक नायक याद राम यादव दिएं वाजें मिंजो बचकाई दित्ता'बाबू जीआप की तबीयत तो ठीक है नमैं देख रहा हूँ आप मील पत्थरों को भी सेल्यूट करते जा रहे हैं (बाबू जीतुसां दी तबीत तां ठीक है न?  मैं दिक्खा दा तुसां मील पत्थरां जो भी सलूट करदे जाह्दे हन)नायक यादव दे एह् बोल सुणी नै मैं अपणियां सीटा गास संभली करी बैठी गिया था। 'हां यादवमैं बिल्कुल ठीक हूँमेरा छोटा देहा जवाब था।

असां दी गड्डी किछ दूर अग्गें चलदिया जोंगा दे पिच्छें-पिच्छें तुरदी बोमडिला दिया चढ़ाइया चढ़दी जाह्दी थी।


हाँ यादव, मैं बिल्कुल ठीक हूँ

ट्रक वन टन 4×4 निसान गाड़ी को नायक याद राम यादव चला रहे थे।  मैं उनकी बगल में बैठा था। हम दोनों का पहला संक्षिप्त सा परिचय गाड़ी की सीट पर बैठे-बैठे ही हुआ था। नायक (डी.एम.टीयाद राम यादव मंझोले कद के गौरवर्णीय तेजतर्रार नवयुवक थे। गाड़ी के पिछले भाग में भी एक  जवान बैठा था। उसका ट्रेड टेलर (दर्जीथा।

सेना में भर्ती होने वाले हर व्यक्ति कोचाहे वह किसी भी ट्रेड का होड्राइवर होक्लर्क हो या कुक होआधारभूत सैनिक प्रशिक्षण के दौरानछोटे हथियार चलाना सिखाया जाता है।  छोटे हथियारों में राइफलकार्बाइन मशीनलाइट मशीन गन और ग्रनेड शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त हथियार के साथ व बिना हथियार कवायदफील्ड क्राफ्ट (रणभूमि कौशल), शारीरिक प्रशिक्षण इत्यादि से गुजरना पड़ता है। यह आधार भूत प्रशिक्षण लगभग पांच माह का होता है। इस प्रशिक्षण से गुजरने के उपरांत  सैनिक को उसके ट्रेड का उन्नत प्रशिक्षण दिया जाता है जिसकी अवधि ट्रेड के हिसाब से अलग अलग होती है। हर वर्दी-धारी सैनिकचाहे उसका ट्रेड कुछ भी होएक लड़ाकू सैनिक होता है। हर सैनिक का अपना एक हथियार होता है जो यूनिट के शस्त्रागार में सुरक्षित रखा रहता है और ज़रूरत पड़ने पर उसे जारी किया जाता है। हर सैनिक अपने हथियार की साफ-सफाई के लिए उत्तरदायी होता है। प्रत्येक फायरिंग अभ्यास से पहले और बाद में इलेक्ट्रिकल मेकैनिकल इंजीनियरज (.एम.कोर के आरमौरर द्वारा हथियारों का निरीक्षण किया जाना अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त वर्ष में एक बार हथियारों समेत गाड़ियोंतोपोंरेडियो सेटों व अन्य यंत्रों का सघन निरीक्षण होता है जिसके लिए जवानों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता है।

कुछ ही देर में गाड़ी उस जगह पर पहुंच गयी जहां यूनिट के उप कमान अधिकारी की गाड़ी से हमारी गाड़ी का मिलाप होना था।  ट्रक वन टन 4×4 निसान सेना की एक शक्तिशाली और भरोसेमंद मध्यम छोटी गाड़ी हुआ करती थी। राजस्थान के रेतीले टीले हों या हिमाच्छादित पर्वतों की सड़केंउस गाड़ी के साथ आसानी से तय किये जा सकते थे पर उस गाड़ी में पेट्रोल की खपत की मात्रा अधिक थी। एक लीटर पेट्रोल से मात्र दो-तीन किलो मीटर ही चल पाती थी। तभी तो वह गाड़ी अब बीते जमाने की चीज बन गयी है। ड्राईवर ने गाड़ी  सड़क के किनारे खड़ी कर दी थी। हम गाड़ी से नीचे उतर कर  उप कमान अधिकारी महोदय की गाड़ी का इंतज़ार करने लगे थे।

एक खूबसूरत नज़ारा हमारे सामने था। हमारे नीचे की ओर कल-कल करती बहती  टेंगा चू (नदीके उस पार के पहाड़ पर सुबह की धूप का दृश्य अद्भत था। कुछ ही देर में रूपा की तरफ से एक जोंगा सर्पाकार सड़क पर मोड़ काटती हुई ऊपर की ओर हमारी तरफ आती दिखाई देने लगी थी। किसी ज़माने में भारतीय सेना का 'वॉर हॉर्सकहलाने वाली जोंगा में भी निसान का वही इंजन था जो ट्रक वन टन गाड़ी में था। अपेक्षाकृत यह एक छोटी गाड़ी थी। जाहिर है कि यह भी एक शक्तिशाली गाड़ी थी पर एक लीटर पेट्रोल से मात्र चार-पांच किलो मीटर ही चलती थी। अब यह गाड़ी भी इतिहास बन गयी है। कुछ ही पलों में वह जोंगा आकर हमारी गाड़ी से आगे खड़ी हो गई थी। लेफ्टिनेंट कर्नल महोदय गाड़ी से उतरे थे और हमारे सैल्यूट का  जवाब दे कर  हमारा हाल चाल पूछने लगे थे।

बातचीत के दौरान मैंने अपने उप कमान अफसर महोदय से पूछा था कि मुझे  वहां अपने आप को गुप्त रखने की हिदायतें देने के पीछे क्या प्रयोजन था। उन्होंने बताया था कि रूपा स्थित पर्वतीय तोपखाना ब्रिगेड के मुख्यालय  में हमारी यूनिट से  मेरे ट्रेड के एक हवलदार को अस्थाई तौर पर काम करने के लिए आना था। यूनिट ने ब्रिगेड मुख्यालय को बताया था कि जब हवलदार भगत राम आयेगा तो उसको उनके पास भेज दिया जायगा। इस तरह यूनिट ने एक तीर से दो निशाने साधे थे — एक तो ब्रिगेड मुख्यालय को अपना जवान तुरंत भेजने की बात को टालना और दूसरा मेरे आने में हो रही देरी को दूर करने में ब्रिगेड मुख्यालय का हस्तक्षेप हासिल करना था। अब स्थिति बदल गई थी।  मिसामारी में मेरी उनसे पहली मुलाकात का जिक्र उन्होंने यूनिट के कमान अफ़सर महोदय से किया था। मेरे एक छोटे से काम से प्रभावित हो कर अब यूनिट मुझे अपने साथ रखना चाहती थी और मेरी जगह किसी और को भेजना चाहती थी। मेरे आने में देरी के कारण बहुत सा पत्राचार हुआ था और रूपा में स्थित उस पर्वतीय तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय में कार्यरत बहुत से लोग मेरे नाम से परिचित थे। इस लिए मेरे वहां आ जाने को छुपाया जा रहा था। अगर ब्रिगेड मुख्यालय में किसी को मेरे वहां आने की भनक लग गई होती तो मुझे वहीं रोक लिया जाना था। यूनिट को अपने ब्रिगेड मुख्यालय के आदेशों का पालन करना होता है।

दोनों गाड़ियां मंथर गति से बोमडीला की टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाई चढ़ रही थीं। पहाड़ी सड़क संकरी थी। कुछ दूर चलने के बाद सड़क के दोनों ओर पाषाण पट्टिकाओं  का एक सिलसिला शुरू हो गया जिनमें 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में बोमडीला की ढलानों में शहीद हुए हमारे सैनिकों के नाम खुदे हुए थे। कहीं-कहीं सड़क दुर्घटनाओं के शिकार बने सैनिकों की यादगारें भी थीं। सन् 1962  के भारत-चीन युद्ध के महायोद्धा ब्रिगेडियर होशियार सिंह के ब्रिगेड को अंतिम विध्वंसकारी आघात इसी बोमडीला में लगा था। शहीदों की समाधियों के बीच में से गुजरते हुए मुझे अजब सी अनुभूति हो रही थी। मैं हर समाधि को सेल्यूट करता जा रहा था। उन शहीदों के बारे में सोच कर मन में तरह-तरह के भाव उमड़ रहे थे। मेरे मन मस्तिष्क में उस स्थान पर 1962 के युद्ध के परिकल्पित दृश्य उमड़ रहे थे। शरीर में एक सिहरन सी अनुभव हो रही थी।  मैं विषम परिस्थितियों में देश रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सैनिकों की स्मृति में खो गया था। तभी नायक याद राम यादव की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया, 'बाबू जीआप की तबीयत तो ठीक है नमैं देख रहा हूँ आप मील पत्थरों को भी सेल्यूट करते जा रहे हैं।नायक यादव के यह बोल सुनते ही मेरी तन्द्रा टूटी थी। मैं अच्छी तरह से संभल कर सीट पर बैठ गया था।  'हां यादवमैं बिल्कुल ठीक हूँमेरा संक्षिप्त सा उत्तर था।

हमारी गाड़ी कुछ दूरी पर आगे चल रही जोंगा का अनुसरण करते बोमडीला की चढ़ाई चढ़ती जा रही थी।

―भगत राम मंडोत्रा

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