9. सेला के ऊपर दौड़

 


सेला के ऊपर दौड़


बोमडिला से नीचे उतर कर हम दिरांग पहुंचे थे। दिरांग बोमडिला से लगभग 42 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।  उसके बाद सेंगे की चढ़ाई प्रारम्भ हो जाती है। दिरांग से सेंगे की दूरी लगभग 37 किलोमीटर है।  इसी दिरांग में सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीनियों ने सेला की रक्षा के लिये तैनात पीछे हटते हुए हमारे इन्फेंट्री ब्रिगेड को बहुत नुकसान पहुंचाया था।  मैंने दिल ही दिल में उन शहीदों को नमन किया था। 


मुझे अपने सैन्य सेवाकाल के दौरान अरुणाचल प्रदेश में तीन बार जाने का अवसर प्राप्त हुआ था।  पहली बार सन् 1989-1991 के दौरान मैं तवांग से आगे लुम्पो में रहा था जिसकी यात्रा का ज़िक्र यहां हो रहा है।  दूसरी बार सन् 2002-2003 में मुझे सुदूर पूर्व में तेजू और वालोंग में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था और अंतिम बार सन् 2003-2005 का समय मैंने दोहंग में व्यतीत किया था। अरुणाचल प्रदेश में तीन-तीन बार जाने के कारण मेरा जम्मू और कश्मीर में जाना नहीं हो पाया था।  मेरी तरह बिरला ही कोई सैनिक होगा जिसने 32 वर्ष सैन्य सेवा की हो और कभी जम्मू और कश्मीर में न गया हो। 


कुछ ही देर में सेंगे के लिए चढ़ाई शुरू हो गयी थी। शाम ढल रही थी। सर्पाकार सड़क को चढ़ते हुए कभी-कभी धूप पर्वत शिखरों पर दिख जाती थी। तभी अचानक मौसम ने अंगड़ाई ली थी और मूसलाधार बारिश शुरू हो गयी थी। गाड़ी के आगे हैड लाईटें जली होने के बावजूद मुझे सड़क नज़र नहीं आ रही थी।  मुझे ताज्जुब हो रहा था कि नायक यादव गाड़ी कैसे चला रहे थे। गाड़ी की विंड शील्ड के अंदर की ओर जमी भाप को साफ करने के लिए मैंने जेब से अपना रुमाल निकाल कर इस्तेमाल किया था पर उस से भी पारदर्शिता में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई थी पर नायक यादव गाड़ी चलाते ही जा रहे थे। मुझे डर लग रहा था कि कहीं गाड़ी संकरी सड़क से फिसल कर नीचे न चली जाए और सफर वहीं न समाप्त हो जाए।  मैंने जब उन्हें बताया था कि सड़क तो दिख नहीं रही। क्यों न हम रुक कर बारिश थमने का इंतजार करें। तब उन का जवाब था, "सर, आप ज़रा भी फिक्र न करें मैं सड़क के एक तरफ जो पहाड़ है  उसका सहारा लेकर रोड का अंदाजा लगा सकता हूँ।  मैं आपको आज सेंगे ज़रूर पहुंचाऊंगा।"  मैं चुपचाप आँखें बंद करके बैठे-बैठे  भगवान से प्रार्थना करता जा रहा था कि नायक यादव का अंदाजा कहीं चूके न। 


जब हम सेंगे पहुँचे तो घुप अंधेरा हो चुका था। उन दिनों सेंगे में सेना का एक ट्रांजिट कैंप हुआ करता था। जब हम कैंप के गेट पर पहुंचे, बारिश थम गई थी। मैंने गाड़ी से उतर कर वहां तैनात संतरी से पूछा था कि हमें रात को कहां ठहरना था। संतरी ने मेरी बात  अनसुनी करते हुए उल्टा मुझ से प्रश्न किया था, "क्या आप हवलदार भगत राम हैं?"  मेरे हाँ कहने पर उसने बताया, "आपके कर्नल साहव, जो यहां  अफ़सर एकमोडेशन मैं ठहरे हैं, बार-बार फोन कर के आपके आने के  बारे में पूछ रहे हैं। पहले आप उनसे बात कीजिये।"  यह कह कर उसने फोन मिला कर हैंड सेट मेरे हाथ में थमा दिया था। उप-कमान अधिकारी ने हमारी कुशल क्षेम पूछी थी और अगली सुबह के सात बजे आगे कूच करने के निर्देश दिए थे। 


सेंगे में अपेक्षाकृत अधिक सर्दी थी। उप-कमान अधिकारी  ने  कहा था कि उन्होंने ट्रांजिट कैम्प वालों को हमारा खाना गर्म रखने के लिये बताया था पर हमें वहां ठंडा खाना ही मिला था।  ये हमारे लिए कोई नई बात नहीं थी।  सैनिक आमतौर पर  ऐसी बातें झेलने के आदी  होते हैं। सैनिक जीवन अपने आप में एक जोखिम भरी यात्रा होता है। इस यात्रा में सैनिक के जीवन का स्वर्णकाल गुज़र जाता है।जो व्यक्ति इस जोखिम भरे सफर का भरपूर आनंद लेते है उन्हें अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण वर्ष इसमें गुजारने का कतई पछतावा नहीं होता है।  


सैनिक निःसन्देह एक कठिन जीवन जीते हैं।  सुगम जीवन जीने की चाह रखने वालों के लिए सैनिक जीवन कदापि उपयुक्त नहीं होता।आरामपरस्त लोग सेना में  जाकर सिस्टम से हमेशा नाराज़ रहते हैं और सेना के लिए नासूर बन जाते हैं। इनका एक उदाहरण आजकल वे नोजवान हैं जो सेना के खाने और सुविधाओं का रोना रोते हुए वीडियो वायरल करते रहते हैं।  कई बार घर में भी तो खाना अच्छा नहीं बनता है पर उसका कोई वीडियो  वायरल  नहीं होता है।  सेना की बैरकें एक सच्चे सैनिक का दूसरा घर होती हैं।  मैंने 32 वर्ष सेना में गुज़ारे।  उस जमाने में सैनिकों को आज की तुलना में कम सुविधाएं उपलब्ध थीं।  कई कठिनाईयों से गुजरना पड़ा। एक दो मौकों पर फ़ौज छोड़ देने की बात भी मन में आई पर मैंने सैनिक जीवन को एडवेंचर के तौर पर लिया और गनर से लेकर सूबेदार मेजर तक का 32 वर्ष लम्बा सफर खुशी-खुशी तय कर लिया।  आज मैं जब वर्दी में अपने पुराने फ़ोटो देखता हूँ तो उन्हें सेल्यूट करने को मन करता है और हृदय में वो जीवन एक बार फिर से जीने की ललक उमड़ती है। 


अगले दिन सुबह  हम ब्रेकफास्ट करके  निर्धारित स्थान पर पहुँच गए थे और लेफ्टिनेंट कर्नल महोदय की जोंगा के पीछे-पीछे चल दिए थे। कुछ देर चढ़ाई चढ़ने के उपरांत हम वैसाखी पहुंच गए थे। वैसाखी सेंगे से लगभग 12 किलोमीटर ऊपर की ओर पड़ती है। उन दिनों वहां पर तोपखाने की एक फ़ील्ड रेजिमेंट का ठिकाना हुआ करता था। हम वहां कुछ देर रुके थे। उन्होंने हमें चाय के साथ गर्मागर्म पकौड़े खिलाए थे।  जिनका हमने भरपूर आनंद लिया था। वैसाखी से सड़क की 14 किलोमीटर तक और चढ़ाई तय कर के हमें सेला की चोटी पर पहुंचना था। 


वहां से रुखसत हो कर हमने आगे की यात्रा जारी रखी थी।  मील पत्थर बताते जा रहे थे कि सेला दर्रे  की दूरी निरंतर कम होती जा रही थी।  सेला दर्रे पर पहुंचने और वहां का नज़ारा देखने की मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।  उतनी ऊंचाई पर होने का आनंद मैं जीवन में पहली बार लेने वाला था। 


लगभग 11 बजे हमारी वन टन गाड़ी सेला के शिखर पर थी।  मैंने नायक यादव को गाड़ी रोकने के लिए कहा था।  गाड़ी रुकते ही मैं नीचे उतरा था। अदभुत मनोरम दृश्य था।  ऐसा लग रहा था कि मैं चहलकदमी करते बादलों को हाथ उठा कर छू सकता था। उप-कमान अधिकारी महोदय की जोंगा सेला के दूसरी और टेढ़ी-मेढ़ी सड़क से  नीचे की ओर स्थित नूरानांग की ओर उतरती साफ-साफ नज़र आ रही थी। सेला पर बर्फ का निशान तक नहीं था। चारों और मनमोहक हरियाली थी, जुलाई का महीना जो था। मैंने सेला पर हर्षोन्माद में लगभग 20-25 मीटर की दौड़ लगाई थी।  ऑक्सीजन की कमी के कारण सांस फूल गया तो दोनों हाथों से अपनी कमर पकड़ कर खड़े-खड़े चारों ओर नज़र दौड़ाई थी। यहीं कहीं 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, सेला की रक्षा के लिये तैनात, शहीद ब्रिगेडियर होशियार सिंह का ब्रिगेड हेड-क्वार्टर हुआ करता था। 


नायक यादव मेरी उन हरकतों को देख कर आश्चर्य चकित मुद्रा में थे। कुछ क्षणों के बाद मैं वापस आकर अपनी सीट पर बैठ गया था और नायक यादव ने गाड़ी गियर में डाल दी थी।  उन्होंने मुझे सावधान किया था कि मुझे उस ऊंचाई पर, बिना अक्लाइमटाइज़ेशन के उतनी तेज दौड़ नहीं लगानी चाहिए थी।  नायक यादव को पता नहीं था कि मैं एक पहाड़ी मुंडा था। 


अरुणाचल प्रदेश के दो जिलों, पश्चिमी कामेंग और तवांग, की सीमा पर स्थित सेला (Sela) दर्रा 13700 फुट से अधिक ऊँचा है और तवांग जाने के रास्ते में पड़ता है। यहां से गुजरने वाला मार्ग तवांग को दिरांग और गुवाहाटी से जोड़ता है। सेला गुवाहाटी से 340 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और तवांग शहर सेला से 78 किलोमीटर आगे है। 


सेला के शिखर के समीप उत्तर दिशा में एक झील स्थित है। बौद्ध धर्म के अनुसार यह झील इस क्षेत्र में पड़ने वाली लगभग 101 पवित्र झीलों में से  एक है। यहां सर्दियों में बहुत बर्फबारी होती है। अगर बरसात में भूस्खलन से मार्ग में बाधाएं न आएं तो यह दर्रा वर्ष भर खुला रहता है। ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में  झील के आसपास का हरा-भरा क्षेत्र याकों की चारागाह के तौर पर इस्तेमाल होता है।


― भगत राम मंडोत्रा

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